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सौन्दर्यलहरी (जगद्गुरु आदि शंकराचार्य - आनन्दलहरी एवं सविस्तार हिन्दी व्याख्या सटीक)

सौन्दर्यलहरी (जगद्गुरु आदि शंकराचार्य - आनन्दलहरी एवं सविस्तार हिन्दी व्याख्या सटीक)

Saundaryalahari of Adi Shankaracharya with Hindi Commentary

by जगद्गुरु आदि शंकराचार्य

DevanagariHindipublished415 pages

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सौंदर्य लहरी २२५
हो जाय, तो वह संबंध भी शिथिल हो जाता है । यह संबंध वास्तव
में एक-पक्षी ही है, उभय-पक्षी नहीं। क्योंकि गुरु की शिष्य के
प्रति श्रद्धा की भावना का होना संभव नहीं, श्रद्धा सदा अपने से
बड़ों के प्रति ही हुआ करती है। परन्तु श्रद्धा की प्रतिक्रिया भी
प्रेम के रूप में प्रकट हुआ करती है, जिससे शिष्य को गुरु की
विद्या फलीभूत होती है। शिष्य गुरु की शरण में श्रद्धा की प्रेरणा
से प्रेरित होकर जाता है, कि उसको वहां से उसकी जिज्ञास्य विद्या
की उपलब्धि होगी । और आध्यात्म पथ का पथिक गुरु से भौतिक
स्तर पर उस प्रकाश की जिज्ञासा रखता है जो उसे तीनों तापों से
मुक्त करदे । इसलिये वह ज्ञानी गुरु की खोज करता है परोक्षज्ञानी
की नहीं, वरन् अनुभवी तत्व ज्ञानी की। श्री भगवान ने भी ऐसे
ही ज्ञानी गुरु की शरण में जाने का आदेश किया है:— यथा,
तद्विद्धि प्रणिपातेन परिप्रश्नेन सेवया ।
उपदेक्ष्यन्ति ते ज्ञानं ज्ञानिनस्तत्वदर्शिनः ॥ गीता ॥
ज्ञानी गुरु योगी तो होना ही चाहिये, क्योंकि बिना योग
संसिद्धि के ज्ञान नहीं होता, श्री भगवान् स्वयं कहते हैं कि:—
'तत्स्वयं योगसंसिद्धः कालेनात्मनि विन्दति । गीता ।
परन्तु योग से भोग और भोगों से रोग भी होते हैं, यह देखने
में आता है । इसलिये यदि गुरु में योग के साथ-साथ भोग भी हों
तो हर्ष की बात है, क्योंकि योगी के पास भोगों की समृद्धि उसकी
सिद्धियों का परिचय देती है। परन्तु भोगों के साथ रोग भी गुरु की