सौन्दर्यलहरी (जगद्गुरु आदि शंकराचार्य - आनन्दलहरी एवं सविस्तार हिन्दी व्याख्या सटीक)
Saundaryalahari of Adi Shankaracharya with Hindi Commentary
by जगद्गुरु आदि शंकराचार्य
Page 260 of 415
Read in context२१० सौंदर्य लहरी
श्लोक में वर्णन किया गया है। जल तत्व का मूलाधार में बेध होकर वह
मणिपूर रूपी अन्तरिक्ष में मेघों के रूप में प्रकट होता है और मेघों
की सहायता से अग्नि का बेध होकर वह विद्युताग्नि में परिणत हो
जाती है। जिसका सुन्दर वर्णन अगले श्लोक में है।
स्वाधिष्ठान में संवर्ताग्नि शिव स्वरूप है और समयादेवी जल
की शिवात्मिका शक्ति, और मणिपूर में मेघेश्वर पर्जन्य जल की
शिवात्मिका शक्ति है और सौदामिनी अग्नि की शक्त्यात्मिका
शक्ति। इसलिये स्वाधिष्ठान में संवर्ताग्नि की ३१ और समयादेवी
की २६, और मणिपूर में मेघेश्वर की २६ और सौदामिनी की
३१ किरणें माननी चाहिये । परन्तु स्वाधिष्ठान में जल की ५२
किरणों का स्थान है और मणिपूर में अग्नि की ६२ किरणों का,
परन्तु दोनों का संक्रमण होने से विपरीतता दृष्टिगोचर होती है।
ब्रह्माण्ड और पिण्ड में शक्ति का अनुभव आधि भौतिक,
विभिन्न स्तरों पर आधि दैविक और आधित्यात्मिक दृष्टि से तीन
शक्ति के प्रकार का किया जाता है। सारा विश्व किसी
विभिन्न रूप शक्ति के आधार पर कार्य कर रहा है उस शक्ति
का हम अनुभव, ताप, शब्द, प्रकाश, चुम्बक,
और विद्युत् के रूप में सदा देखते हैं और उनकी सहायता से अनेक
कार्य करते हैं। परन्तु विज्ञान इस निष्कर्ष पर पहुंचता है कि ये
सब रूप किसी एक ही शक्ति के परिणाम है। शक्ति का यह रूप
अधि भौतिक ( physical ) कहलाता है। दूसरा रूप हम अपने
शरीर में अनुभव करते हैं, जो देह, इन्द्रियों और मन बुद्धि में काम
करता है। उसे हम अध्यात्म रूप कहते हैं। परन्तु अध्यात्म शक्तियां