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सौन्दर्यलहरी (जगद्गुरु आदि शंकराचार्य - आनन्दलहरी एवं सविस्तार हिन्दी व्याख्या सटीक)

सौन्दर्यलहरी (जगद्गुरु आदि शंकराचार्य - आनन्दलहरी एवं सविस्तार हिन्दी व्याख्या सटीक)

Saundaryalahari of Adi Shankaracharya with Hindi Commentary

by जगद्गुरु आदि शंकराचार्य

DevanagariHindipublished415 pages

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Page 259

सौंदर्य लहरी २०९
हो सकती है; परन्तु ऐसा होता नहीं, शरीर ही तो दोनों मोक्ष का
और भोग का साधन है। जब तक जीवन मुक्ति की दशा की
प्राप्ति नहीं होती, शरीर की रक्षा करना परम कर्तव्य है। इसलिये
षट्चक्रवेध द्वारा लयक्रम और शरीर का पुनः निर्माण एवं संगठन अथवा
जीर्णोद्धार रूपी सृष्टि स्थिति क्रम भी युगपद् चलता रहता है।
इसी अभिप्राय से संवर्ताग्नि की संहार क्रिया को संयम में रखने के
लिये समयादेवी अपनी दयार्द्र दृष्टि से शीतल उपचार करती रहती है।
अनाहत् चक्र के नीचे नाभिस्थान में मणिपूर, और उसके नीचे
उपस्थ के पीछे स्वाधिष्ठान, और गुदा के पास मूलाधार की स्थिति
है। दोनों के बीच में योनि स्थान है, जो अग्नि की पीठ मानी
जाती है। योनिस्थान का संबंध स्वाधिष्ठान से भी है, इसलिये अग्नि
को स्वाधिष्ठान चक्र में रहने वाला कहा गया है। श्लोक ९ की
पद रचना, इस दृष्टिकोण को सामने रख कर, समझनी चाहिये।
यह कहा जा चुका है:—'महींमूलाधारे कमपि, मणिपूरे हुतवहं स्थितं
स्वाधिष्ठाने, इत्यादि भित्वा....। अर्थात् मूलाधार में पृथिवी और
जल को भी, और मणिपूर में अग्नि को, जो स्वाधिष्ठान में स्थित है,
बेध करके इत्यादि'। उस श्लोक में तत्वों के वेध का स्थान एवं क्रम
बताया गया है, और उनकी स्थिति के लिये केवल अग्नि तत्त्व के
स्थान का संकेत है, अन्य तत्वों के स्थान का नहीं, क्योंकि
अन्य तत्वों के स्थान और उनके वेध के स्थान एक ही हैं। केवल
स्वाधिष्ठान चक्र में जल और अग्नि दोनोंका संधि स्थान है। इसलिये
वायु के पश्चात् अग्नि का वर्णन करने के लिये पहिले उसकी स्थिति
के स्थान स्वाधिष्ठान का और फिर वेध के स्थान मणिपूर का अगले