सौन्दर्यलहरी (जगद्गुरु आदि शंकराचार्य - आनन्दलहरी एवं सविस्तार हिन्दी व्याख्या सटीक)
Saundaryalahari of Adi Shankaracharya with Hindi Commentary
by जगद्गुरु आदि शंकराचार्य
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बाह्य शक्तियों की अपेक्षा रखती हैं, जैसे दृष्टि सूर्य की, रसना जल
की इत्यादि। इस संबंध को अधि दैव कहते हैं। इसलिये प्रत्येक
इन्द्रिय का पृथक् २ अधिदेवता है। उनके नाम ये हैं अहंकार का
रुद्र, चित्त का क्षेत्रज्ञ, बुद्धि का ब्रह्मा, मन का चन्द्रमा, श्रवण का
आकाश, स्पर्श का वायु, दृष्टि का सूर्य, रसनेन्द्रिय का वरुण, गन्ध
का पृथिवी, वाणी का सरस्वती, हाथों का इन्द्र, पैरों का सर्वाधार
विष्णु, मैथुन का प्रजापति और मल त्याग का यमराज मृत्यु।
अर्थात् प्रत्येक इन्द्रिय में उक्त देवताओं की शक्तियां कार्य करती
हैं, जो उनका ब्रह्माण्ड से संबंध जोडती हैं। प्राण का सूर्य, अपान
का पृथिवी, समान का आकाश, व्यान का वायु और उदान का
अग्नि अधिदेव हैं। पृथिवी की आकर्षण शक्ति ( gravitation )
को ही अपान शक्ति कहा जाता है, उसका संबंध विष्णु और मृत्यु
दोनों से है, इसलिये उसे मर्त्य लोक भी कहते हैं। कहा है—
'पृथिवि त्वया धृता लोका देवि त्वं विष्णुना धृता।' ऊपर उठाने
वाली शक्ति उसकी प्रति पक्षी शक्ति उदान है, उसका संबंध अग्नि
से है। अग्नि की ज्वालायं ऊपर उठती हैं, वायु तप्त होकर ऊपर
उठता है, इसी तरह मृत्यु के पश्चात् उदान ही जीव को कर्मानुसार
अन्य लोकों को ले जाता है।
जिस प्रकार बाह्य शक्तियों का एक आधार शेष नाग माना जाता
है, उसी प्रकार अभ्यन्तर शक्तियों का आधार कुण्डलिनी शक्ति
मानी जाती है। परन्तु सब शक्तियों का, जिनमें शेष नाग और
कुण्डलिनी रूपी आधार भी सम्मिलित है, उदय और अस्त पद
परमात्मा ही है। इसलिये परमात्मा की अपेक्षा से सब शक्तियों के