सौन्दर्यलहरी (जगद्गुरु आदि शंकराचार्य - आनन्दलहरी एवं सविस्तार हिन्दी व्याख्या सटीक)
Saundaryalahari of Adi Shankaracharya with Hindi Commentary
by जगद्गुरु आदि शंकराचार्य
Page 258 of 415
Read in context२०८ सौंदर्य लहरी
स्वाधिष्ठान=स्व+अधि+स्थान, कुण्डलिनी शक्ति का जागने के
पश्चात् सुषुम्ना के भीतर रहने का अपना स्थान ।
संवर्ताग्नि=अच्छी तरह से वर्तमान रहने वाला अग्नि । प्रलयाग्नि
को संवर्ताग्नि कहते हैं । यह रुद्र का रूप है ।
समया देवी=समयाचार की देवी ।
कुण्डलिनी शक्ति के जागने का फल समाधि है । कुण्डलिनी
महायोग का एक अंग लययोग भी है और षट् चक्र वेध द्वारा तत्वों
का वेध पूर्वक प्रतिप्रसवक्रम भी एक अंग है । प्रतिप्रसवक्रम प्रसव के
उलट क्रम को कहते हैं । अर्थात् योगी प्रतिप्रसवक्रम का आश्रय लेकर
ही षट् चक्र वेध करता है और पंच महाभूतों पर जय प्राप्त करता
है । प्रलय के समय भी संवर्ताग्नि पृथिवी को जल में, जल को तेज
में, तेज को वायु में और वायु को आकाश में लीन करता हुआ,
सब तत्वों को प्रकृति लीन कर देता है ।
सृष्टिक्रम में शक्ति प्रभवाभिमुख होकर फिर विविध रचना
करने लगती है, मानो वह देवी दयार्द्रदृष्टि से संवर्ताग्नि को शान्त
करके लोकानुग्रह करती है । वास्तव में सृष्टि स्थिति और संहार की
त्रिधा शक्ति निरंतर अणु २ में कार्य करती रहती है, परन्तु योगी
क षट्चक्र वेध के समय लयक्रम प्रधान रहता है इसलिये कहा गया
है कि स्वाधिष्ठान चक्र में अग्नितत्व का संयम पूर्वक प्रयोग होकर
पृथिवी और जल दोनों का वेध मूलाधार में होता है और अग्नि का
वेध मणिपूर में होता है । जैसा श्लोक ९ में समझाया जा चुका है ।
यदि यह लयक्रम तीव्र हो तो शरीर के नष्ट होने की सम्भावना