सौन्दर्यलहरी (जगद्गुरु आदि शंकराचार्य - आनन्दलहरी एवं सविस्तार हिन्दी व्याख्या सटीक)
Saundaryalahari of Adi Shankaracharya with Hindi Commentary
by जगद्गुरु आदि शंकराचार्य
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शक्कर और मीठापन । परम भाव शक्कर सदृश विशेष्य है और
आनन्द मीठेपन के सदृश विशेषण, प्रथम रूप शिव का है और
दूसरा शक्ति का । परानन्द का मार्ग शक्ति का योग मार्ग है । और
ज्ञान मार्ग वैदिक वेदान्त का मार्ग है । यहां यह दिखाया
गया है कि दोनों मार्गों का इतना एकरस पना है कि जैसे विशेषण
और विशेषी का, अर्थात् दोनों मार्ग पारस्परिक सापेक्षिक हैं और
एक दूसरे के बिना अपूर्ण हैं । आनन्द के मार्ग को भाव योग
कहते हैं जो कुण्डलिनी शक्ति के जागने पर प्राप्त होता है और
ज्ञान मार्ग आत्म चिन्त रूप ध्यान योग का मार्ग है। गीता के १२ वें
अध्याय में श्री भगवान ने प्रथम भाव योग को सरल बताकर उसकी
श्लाघा की है और ज्ञानमार्ग को कठिन कहकर उसकी प्राप्ति को
दुःख साध्य बताया है ।
'नवात्म=शंकर । शिव, शक्ति और श्री चक्र तीनों ९ व्यूहात्म
हैं । तीनों के ९ नौ २ व्यूह नीचे दिये जाते हैं । शिव के ९
व्यूहः— काल, कुल, नाम, ज्ञान, चित्त, नाद, विन्दु, कला
और जीव ।
शक्ति के ९ व्यूहः— वामा, ज्येष्ठा, रौद्री, अंबिका, इच्छा,
ज्ञान, क्रिया, शान्ति और परा ।
श्री चक्र के ९ व्यूहः— ११ श्लोकोक्त ४ श्रीकंठ और ५
शिव युवतियां अर्थात् ९ मूल त्रिकोण । इसलिये शिवजी सब के
अधिष्ठातृ देव अर्थात् आत्मा होने के कारण नवात्मा कहे गये हैं ।