सौन्दर्यलहरी (जगद्गुरु आदि शंकराचार्य - आनन्दलहरी एवं सविस्तार हिन्दी व्याख्या सटीक)
Saundaryalahari of Adi Shankaracharya with Hindi Commentary
by जगद्गुरु आदि शंकराचार्य
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Read in contextसौंदर्य लहरी १९३
साराविश्व शक्ति का परिणाम है
( ३५ )
मनस्त्वं व्योमस्त्वं मरुदसि मरुत्सारथिरसि
त्वमापस्त्वं भूमिस्त्वयि परिणतायां नहि परम् ।
त्वमेव स्वात्मानं परिणमयितुं विश्ववपुषा
चिदानन्दाकारं शिवयुवति भावेन बिभृषे ॥
अर्थः - हे शिवयुवति ! तू मन है, आकाश तू है और
वायु है सारथी जिसका वह अग्नि भी तू ही है, तू जल है और
तू भूमि है; तेरी परिणति के बाहर कुछ भी नहीं । अर्थात्
सारा विश्व तेरे परिणाम का ही रूप है । तू ने ही अपने आप
को परिणत करने के लिये, चिदानन्दाकार को विराट देह के
भाव द्वारा व्यक्त किया हुआ है
सं० टि०:- जैसे श्लोक (३४) विश्व और शिव की एकता
दिखाता है, वैसे ही (३५) श्लोक में चिदानन्द को समझना
चाहिये, अर्थात् यह अध्यात्म स्वरूप है । यहां चित् और आनन्द
का जोडा भी उसी प्रकार समझना चाहिये । मन, आकाश, वायु,
अग्नि, जल, पृथिवी सत् शक्ति के विकार हैं उनसे आज्ञा, विशुद्ध,
अनाहत, मणिपूर, स्वाधिष्ठान और आधार चक्रों से संबंधित् तत्त्वों
के अधि देवताओं का संकेत है, जिनका अगले श्लोकों में वर्णन है ।
ये चिदानन्दाकारा भगवती के ही रूप हैं ।