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सौन्दर्यलहरी (जगद्गुरु आदि शंकराचार्य - आनन्दलहरी एवं सविस्तार हिन्दी व्याख्या सटीक)

सौन्दर्यलहरी (जगद्गुरु आदि शंकराचार्य - आनन्दलहरी एवं सविस्तार हिन्दी व्याख्या सटीक)

Saundaryalahari of Adi Shankaracharya with Hindi Commentary

by जगद्गुरु आदि शंकराचार्य

DevanagariHindipublished415 pages

Page 241 of 415

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Page 241

सौंदर्य लहरी १०१
सं० टि० शक्ति को शिव का स्थूल देह समझना चाहिये ।
शंकर का एक नाम चिदंबर भी है। सांग विश्व (ब्रह्माण्ड) शक्ति का
रूप है और वह विराट् भगवान का स्थूल देह है। इसलिये शिव
और शक्ति का आधार आधेय संबंध यहां दिखाया गया है । यदि
पर पद शिव है तो आनन्द पद को शक्ति का रूप समझना चाहिये ।
दोनों की एकता का समरसपना दोनों की अभिन्नता प्रकट करता है ।
जैसे शक्कर और उसकी मधुरता । यह अधिदैव रूप है अर्थात्
चित् और आनन्द का जोडा ही ब्रह्म और शक्ति का जोडा है ।
अधि भौतिक स्तर पर भी ऐसा ही समझना चाहिये, सत् प्रकृति है
और चिदानन्द शिव्
व्याख्या— वेदों और पुराणों में सूर्य और चन्द्र को विराट्
भगवान के नेत्र माना गया है, परन्तु यहां उन्हें जगज्जननी प्रकृति
के दोनों स्तनों से उपमित किया गया है, क्योंकि प्राण और सोम
दोनों से विश्व का पोषण होता है । सूर्य से विश्व को प्राण शक्ति
प्राप्त होती है और चन्द्रमा से सोम रस । आध्यात्मिक स्तर पर भी
सूर्य हृदय में रहकर और चन्द्र मस्तिष्क में रहकर रक्षा करते है ।
सत् चित् आनन्द स्वरूप ब्रह्म के सत् स्वरूप का परिणाम सारा
विश्व है, और आध्यात्म स्तर पर चेतन सत्ता दो स्तरों पर दृष्टि-
गोचर होती है, आनन्द के रूप में और ज्ञान के रूप में । इस
श्लोक में ज्ञान के रूप को शिव अथवा परम भाव कहा है और
आनन्द को शक्ति भाव । दोनों भाव समरस वत् एक ही हैं जैसे