सौन्दर्यलहरी (जगद्गुरु आदि शंकराचार्य - आनन्दलहरी एवं सविस्तार हिन्दी व्याख्या सटीक)
Saundaryalahari of Adi Shankaracharya with Hindi Commentary
by जगद्गुरु आदि शंकराचार्य
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ग्रीवा के ऊपर तालु का अन्तिम भाग नीचे की ओर लटका
करता है, उसे लंबिका ( काग ) कहते हैं। वह भी एक चक्र माना
जाता है। तैत्तिरीयोपनिषद् के छठे अनुवाक् में इसको इन्द्रयोनि
नाम दिया गया है, जिसका शीर्षकपाल से संबंध है। और नीचे
उसका हृदयाकाश से भी संबंध है। इस प्रकार अहंवृत्ति को हृदया-
काश से ब्रह्म रंध्र में ले जाने का लंबिका द्वारा सुषुम्ना से बाहर भी
एक मार्ग है, जिसका कपाल कंद से सीधा संबंध है, अर्थात् वह
हृदय के अष्टदल पद्म का सीधा मनश्चक्र से संबंध जोडता है।
इसीलिये हृदय के इस चक्र को सुषुम्नागत षट् चक्रों से पृथक चक्र
माना जाता है।
ऊपर कहा जा चुका है कि कपाल कंद से पांचों ज्ञानेन्द्रियों
और उनके गोलकों से संबंध रखने वाली नाडियों का निकास है।
उनमें से एक नाडी ग्रीवा से नीचे उतरकर वक्षस्, उदर, कटि भाग
में गुदा तक नीचे उतरती है, उसे अंग्रेजी में Vagus nerve
कहते हैं, योग के आचार्यों ने उस के विभिन्न स्तरों पर विभिन्न
नाम दिये हैं, जैसे कूर्म, विश्वोदरी, कुहू इत्यादि। इस नाडी की
वाम शाखा निरर्थक सी है, परन्तु दक्षिण शाखा के तीन विभाग हैं,
अर्थात् वक्ष, उदर और कटि देश के भाग। वक्ष के भाग में प्राण,
उदर के भाग में समान और नीचे के भाग में अपान के स्थान हैं।
इस नाडी का संबंध ईडा और पिंगला की मुख्य नाडियों
(sympathetic columns) से भी है, और उनका संबंध
सुषुम्ना के चक्रों से है। इसलिये यह प्राण समान अपान की नाडी