सौन्दर्यलहरी (जगद्गुरु आदि शंकराचार्य - आनन्दलहरी एवं सविस्तार हिन्दी व्याख्या सटीक)
Saundaryalahari of Adi Shankaracharya with Hindi Commentary
by जगद्गुरु आदि शंकराचार्य
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स्वतंत्र है और मन के आधीन कार्य नहीं करती । इसको स्वतंत्र
नाडीविभाग (autonomous system) कहते हैं ।
सुषुम्ना के तीन परत होते हैं ऊपर के परत वाले भाग को
वज्रा कहते हैं, उसके नीचे का परत चित्रा कहलाता है जिसके बीच
में एक नलिका है । सुषुम्नागत छः चक्र अथवा कमल चित्रा में होते
हैं और बीच वाली नलिका को पुष्प के बीच वाली नलिका सदृश
समझना चाहिये, उसे ही ब्रह्म नाडी या विरजा कहते हैं ।
इस श्लोक में जिन छः पद्मों के ऊपर महापद्मावटी में भगवती
की कला की स्थिति कही गई, वे चित्रास्थित छः चक्र अथवा पद्म
हैं ! छओं चक्रों के छः अधिदेवता हैं । मूलाधार के ब्रह्मा, स्वाधि-
ष्ठान के विष्णु, मणिपूर के रुद्र, अनाहत के ईश्वर, विशुद्ध के
सदाशिव और आज्ञा के पर शिव । इनके अरों अथवा दलों की
संख्या तत्वों की कला के अनुसार है । अग्नि की १०, सूर्य की
१२, चन्द्रमा की १६, कलाएं क्रमशः मणिपूर अनाहत और
विशुद्ध के दलों के बराबर हैं । ब्रह्मा विष्णु और रुद्र प्रत्येक की
दस २ कलायें हैं, ईश्वर की चार और सदाशिव की १६ कलायें हैं ।
मूलाधार की ४, स्वाधिष्ठान की ६, और आज्ञा की दो शिराओं
को भी कला कहें तो सब का योग पूरा १०० होता है । आज्ञा
में परशिव निष्कल है, जिसकी शक्ति की ही ये सब कलाए कही
जा सकी हैं, अर्थात् सहस्रार स्थित भगवती की कला के ये सब
अवान्तर भेद हैं, अथवा वे निम्न स्तरों पर चमकने वाली प्रतिबिंब
सदृश कही जा सकती हैं । कलाओं के नाम नीचे दिये जायेंगे ।