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सौन्दर्यलहरी (जगद्गुरु आदि शंकराचार्य - आनन्दलहरी एवं सविस्तार हिन्दी व्याख्या सटीक)

सौन्दर्यलहरी (जगद्गुरु आदि शंकराचार्य - आनन्दलहरी एवं सविस्तार हिन्दी व्याख्या सटीक)

Saundaryalahari of Adi Shankaracharya with Hindi Commentary

by जगद्गुरु आदि शंकराचार्य

DevanagariHindipublished415 pages

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Page 188

१४० सौंदर्य लहरी
जाती है। सुषुम्ना नाडी मेरु दण्ड के भीतर सुरक्षित है। जिसकी
आकृति ∞ के सदृश मिलती हुई सी समझनी चाहिये। किसी
पदार्थ के ऐसे पुर्जों को एक दूसरे पर रखकर और दोनों ओर के
बड़े छिद्रों में दोनों ओर बारीक तारों के गुच्छों को पिरोकर सब
पुर्जों को ग्रथित कर लिया जाय तो वह सर्पाकार सुषुम्ना का ढांचा सा
दिखने लगेगा। सुषुम्ना में तारों के स्थान पर वे स्नायु हैं जो
मस्तिष्क को देह में फैले हुए समस्त नाडी जाल से संबंधित करते
हैं। और बीच के छिद्र से बनी नलिका में एक द्रव्य पदार्थ
भरा रहता है जिसको चन्द्र मण्डल से निकलने वाला अमृत कहते
हैं, इसे सुषुम्ना मानों पान कर के पुष्ट होती है। अंग्रेजी में इसे
(cerebro spinal fluid) अर्थात् मास्तिष्क सौष्मन द्रव्य
कहते हैं। सुषुम्ना के अन्दर गुदा, उपस्थ, नाभि, वक्षस्, ग्रीवा के
५ प्रदेशों से संबंधित ५ चक्र हैं, जिनको विभिन्न अंगों की नाडियों
से सुषुम्ना का संबंध होता है। सुषुम्ना के दोनों तरफ के स्नायु
भ्रूमध्य प्रदेश में एक बिन्दु पर मिलकर दक्षिण भाग से वाम ओर
और वाम भाग से दक्षिण ओर होकर सहस्रार में चढ जाते हैं, इस
भ्रूमध्य स्थान को आज्ञा चक्र कहते हैं। ग्रीवा प्रदेश के चक्र को
विशुद्ध, वक्षस् के चक्र को अनाहत्, नाभि प्रदेश के चक्र को
मणिपुर, उपस्थ देश के चक्र को स्वाधिष्ठान और गुदा प्रदेश के
चक्र को मूलाधार कहते हैं। भ्रूमध्य से ऊपर कपाल संपुट में सुषुम्ना
का ऊर्ध्व भाग चार रूपों में परिणत हो जाता है। सब से नीचे का
भ्रूमध्यस्थ अधोभाग (modula oblangata) कहलाता है,
उसके ऊपर छोटा मस्तिष्क (cerebellum or hind brain)
कहलाता है, इसको कपाल कंद कहते हैं, यहां पर पांचों ज्ञानेंद्रियों