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सौन्दर्यलहरी (जगद्गुरु आदि शंकराचार्य - आनन्दलहरी एवं सविस्तार हिन्दी व्याख्या सटीक)

सौन्दर्यलहरी (जगद्गुरु आदि शंकराचार्य - आनन्दलहरी एवं सविस्तार हिन्दी व्याख्या सटीक)

Saundaryalahari of Adi Shankaracharya with Hindi Commentary

by जगद्गुरु आदि शंकराचार्य

DevanagariHindipublished415 pages

Page 187 of 415

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Page 187

सौन्दर्य लहरी १३९
चक्रों और सहस्रार का सविस्तार वर्णन
स्थूल देह सप्त धातुओं का बना है । जो अन्न जल खाया
पिया जाता है, वह जठराग्नि से पचकर रस बनाता है, रस से रुधिर,
रुधिर से मांस, मांस से मेदा, मेदा से स्नायु, स्नायु से अस्थि,
अस्थि से मज्जा, और मज्जा से शुक्र । रुधिर, मांस, मेदा ( चर्बी, )
स्नायु, अस्थि, मज्जा, और शुक्र ( वीर्य ) सप्त धातु कहलाती हैं ।
रक्त को अंग प्रत्यंग में पहुंचाने के लिये रक्त वाहिनी ( arteries )
नलिकाओं सदृश नाडियां हैं, जब वह रक्त दूषित होकर नीला हो
जाता है तब उसको स्वच्छ करने के लिये हृदय में खेंचकर फुफुसों
में पहुंचाया जाता है, वहां श्वास द्वारा वह फिर स्वच्छ हो जाने
पर हृदय में खेंच लिया जाता है और रक्त वाहिनी नाडियों में भेज
दिया जाता है । हृदय पंप का कार्य करता रहता है, जिसका एक
ओर फुफुसों से संबंध है दूसरी ओर रक्त को लाने और ले जाने
वाली नलिकाओं से । नीले रंग के दूषित रक्त को हृदय में
खेंचने वाली नलिकायें पित्त नाडियां ( veins ) कहलाती हैं ।
इसी प्रकार मेदस् ( चर्बी ) बनाने वाले द्रव्य की भी नलिकायें
होती हैं जिनको कफ वाहिनी (Lymphs) नाडियां कहते हैं ।
मेदा से स्नायु की उत्पत्ति बताई जाती है । ये स्नायु वात, अर्थात्
प्राण वाहिनी नाडियां ( nerves ) कहलाती हैं । मज्जा अस्थियों
की नलिकाओं में होती है और शुक्र, शुक्राशय में अण्डकोषों
द्वारा बनता है । यहां हम स्नायुओं को ही नाडी नाम से संबोधित
करते हैं । ये नाडियां सुषुम्ना नाडी के द्वारा आनख शिख देह का
मस्तिष्क से संबंध जोडती हैं । इनकी सख्या ७२ हजार कही