Skip to content
SarvaKosh
सौन्दर्यलहरी (जगद्गुरु आदि शंकराचार्य - आनन्दलहरी एवं सविस्तार हिन्दी व्याख्या सटीक)

सौन्दर्यलहरी (जगद्गुरु आदि शंकराचार्य - आनन्दलहरी एवं सविस्तार हिन्दी व्याख्या सटीक)

Saundaryalahari of Adi Shankaracharya with Hindi Commentary

by जगद्गुरु आदि शंकराचार्य

DevanagariHindipublished415 pages

Page 147 of 415

Read in context
Page 147

सौंदर्य लहरी १०२
श्रीचक्र
अगले श्लोक में श्रीचक्र का निरूपण करके बहिर्याग का
संकेत है।
(११)
चतुर्भिः श्रीकण्ठैः शिवयुवतिभिः पंचभिरपि
प्रभिन्नाभिः शंभोर्नवभिरपि मूल प्रकृतिभिः ।
त्रयश्चत्वारिंशद्वसुदल कलाश्च त्रिवलय-
त्रिरेखाभिः सार्धं तव शरण (भवन) कोणाःपरिणताः
नोटः—कोष्ठकों में पाठान्तर दिया गया है ।
अर्थः—चार श्रीकंठ और पांच शिवयुवतियां, इन ९ मूल
प्रकृतियों से तेरे रहने के ४३ त्रिकोण बनते हैं, जो
शंभु के बिन्दुस्थान से भिन्न हैं। वे तीन वृत्तों (circles)
और तीन रेखाओं सहित ८ और १६ दलों से युक्त हैं ।
सं० टि०—यहां बहिर्याग का वर्णन है। श्रीचक्र के बनाने के
तीन भेद होते हैं, मेरु, कैलाश और भूः । तीन भेदों मे शक्तियों के
स्थानों और पूजन विधि में अन्तर है। मेरु श्रीचक्र में उसका १६
नित्या कलाओं से, कैलाश के प्रतीक स्वरूप श्रीचक्र में उसको ८ मातृका
शक्तियों से और भूः के प्रतीक स्वरूप श्रीचक्र में उसे ८ वशिनी-
देवियों से संबंधित चक्र समझा जाता है। तैत्तिरीयारण्यक में कहा है
कि पृश्नि ऋषियों ने श्रीचक्र की पूजा की थी और उसकी सहायता