सौन्दर्यलहरी (जगद्गुरु आदि शंकराचार्य - आनन्दलहरी एवं सविस्तार हिन्दी व्याख्या सटीक)
Saundaryalahari of Adi Shankaracharya with Hindi Commentary
by जगद्गुरु आदि शंकराचार्य
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Read in contextसौंदर्य लहरी १०२
श्रीचक्र
अगले श्लोक में श्रीचक्र का निरूपण करके बहिर्याग का
संकेत है।
(११)
चतुर्भिः श्रीकण्ठैः शिवयुवतिभिः पंचभिरपि
प्रभिन्नाभिः शंभोर्नवभिरपि मूल प्रकृतिभिः ।
त्रयश्चत्वारिंशद्वसुदल कलाश्च त्रिवलय-
त्रिरेखाभिः सार्धं तव शरण (भवन) कोणाःपरिणताः
नोटः—कोष्ठकों में पाठान्तर दिया गया है ।
अर्थः—चार श्रीकंठ और पांच शिवयुवतियां, इन ९ मूल
प्रकृतियों से तेरे रहने के ४३ त्रिकोण बनते हैं, जो
शंभु के बिन्दुस्थान से भिन्न हैं। वे तीन वृत्तों (circles)
और तीन रेखाओं सहित ८ और १६ दलों से युक्त हैं ।
सं० टि०—यहां बहिर्याग का वर्णन है। श्रीचक्र के बनाने के
तीन भेद होते हैं, मेरु, कैलाश और भूः । तीन भेदों मे शक्तियों के
स्थानों और पूजन विधि में अन्तर है। मेरु श्रीचक्र में उसका १६
नित्या कलाओं से, कैलाश के प्रतीक स्वरूप श्रीचक्र में उसको ८ मातृका
शक्तियों से और भूः के प्रतीक स्वरूप श्रीचक्र में उसे ८ वशिनी-
देवियों से संबंधित चक्र समझा जाता है। तैत्तिरीयारण्यक में कहा है
कि पृश्नि ऋषियों ने श्रीचक्र की पूजा की थी और उसकी सहायता