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सौन्दर्यलहरी (जगद्गुरु आदि शंकराचार्य - आनन्दलहरी एवं सविस्तार हिन्दी व्याख्या सटीक)

सौन्दर्यलहरी (जगद्गुरु आदि शंकराचार्य - आनन्दलहरी एवं सविस्तार हिन्दी व्याख्या सटीक)

Saundaryalahari of Adi Shankaracharya with Hindi Commentary

by जगद्गुरु आदि शंकराचार्य

DevanagariHindipublished415 pages

Page 148 of 415

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Page 148

१०६ सौन्दर्य लहरी
से कुण्डलिनी का जागरण करके सहस्रार में शक्ति को उठाया था।
इससे विदित होता है कि यह वैदिक मार्ग है।
श्रीचक्र ब्रह्मांड और पिण्ड दोनों का प्रतीक होता है, इसकी
रचना ४ श्रीकंठ अर्थात् शिव त्रिकोण और ५ शिवयुवति अर्थात्
शक्ति त्रिकोणों के योग से होती है। शिव और शक्ति त्रिकोणों
का मुख एक दूसरे के विपरीत रहता है, जैसे △ ▽ । सृष्टि क्रम में
५ शक्ति त्रिकोण उर्ध्वमुख होतें हैं और ४ शिव त्रिकोण अधोमुख
और अप्यय क्रम में शक्ति त्रिकोण अधोमुख और शिव त्रिकोण
ऊर्ध्वमुख रखे जाते हैं। प्रथम केन्द्रीय त्रिकोण को जिसके केन्द्र में
शंभु का स्थान है, छोड कर शेष त्रिकोणों की संख्या
४२ हैं। इसलिये त्रयश्चत्वारिंशत् पाठ ठीक है। प्रथम मध्य
त्रिकोण के बाहर चारों ओर दूसरे नंबर पर ८ कोण बनते हैं, उसको
अष्टकोण कहते हैं, फिर तीसरे और चौथे स्तर पर दस २ कोण
बनते हैं उन्हें अन्तर्दशार और बहिर्दशार कहते हैं, उनके ऊपर १४
कोण बनते हैं, उनको चतुर्दशार कहते हैं। सबका योग १+८+१०
+१०+१४ = ४३ होता है। मध्य केन्द्रीय विन्दु शंभु का स्थान
है जो प्रकृति स्वरूप ९ त्रिकोणों के योग से रचित पूरे चक्र से
पृथक् अर्थात् असंग है। उक्त ४३कोणों के चक्र के बाहर प्रथम वृत्त
(circle) पर अष्ट दल पद्म और उसके बाहर दूसरे वृत्त पर षोडश-
दलपद्म हैं, षोडशदलपद्म तीन वृत्तों से घिरा है। सबके बाहर तीन
रेखाओं का चतुष्कोण है, जिसे भूगृह कहते हैं। भूगृह की चारों
भुजाएं बराबर हैं और चारों दिशाओं में ४ द्वार होते हैं। इस श्लोक
में द्वारों का उल्लेख नहीं किया गया है।