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सौन्दर्यलहरी (जगद्गुरु आदि शंकराचार्य - आनन्दलहरी एवं सविस्तार हिन्दी व्याख्या सटीक)

सौन्दर्यलहरी (जगद्गुरु आदि शंकराचार्य - आनन्दलहरी एवं सविस्तार हिन्दी व्याख्या सटीक)

Saundaryalahari of Adi Shankaracharya with Hindi Commentary

by जगद्गुरु आदि शंकराचार्य

DevanagariHindipublished415 pages

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Page 146

१०४ सौंदर्य लहरी
पर आकर ३।। कुण्डलाकृति सर्पिणीवत् सो जाती है । कुल का अर्थ
शक्ति समझना चाहिये और कुण्ड से उसके रहने का कुंड सदृश
स्थान समझना चाहिये । कुहरिणी का अर्थ कुहर अर्थात् बिल में
रहने वाली है । कुहर बिल, छिद्र अथवा रंध्र को कहते हैं । नाडियों
द्वारा प्रपंच का सींचे जाने का संबन्ध छःओं चक्रों के द्वारा होने
के कारण रसाम्नायमहसा का अर्थ जैसा हमने किया है उचित प्रतीत
होता है । रस पद से छः और आम्नाय पद से 'मार्ग' अर्थ लेने से
यह अर्थ किया गया है । आम्नाय का अर्थ मार्ग दिखाने वाले वेद,
और गुरु परम्परा गत संप्रदायोपदेश हैं । और महस् का अर्थ उत्सव
और तेज दोनों है (महस्तूत्सवतेजसोः, इति अमरः) इसलिये पूरे
पद का तृतीयांत अर्थ छः तेजोमय आम्नायों के द्वारा, अथवा रस
(अमृत) से पूर्ण तेजोमय आम्नाय द्वारा होगा, पंचमी विभक्ति में
'द्वारा' की जगह 'से' लगाना पडेगा । आम्नाय से चाहे चन्द्र
अथवा चक्र समझा जा सकता है । महस् का अर्थ उत्सव भी किया
जा सकता, उस पर्याय में शक्ति का शिव के योग से अमृत सिंचन
रूपी उत्सव समझना चाहिये । तांत्रिक पद्धति के अनुसार उपासना
के पूर्व, पश्चिम, उत्तर, दक्षिण, उर्द्ध और वाम छः आम्नाय हैं, उन
सबका फल शक्ति का जागरण होकर समाधि प्राप्त करना ही है ।
उक्त आम्नाय गुरु परम्परागत उपदेश से जानने चाहिये ।