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सौन्दर्यलहरी (जगद्गुरु आदि शंकराचार्य - आनन्दलहरी एवं सविस्तार हिन्दी व्याख्या सटीक)

सौन्दर्यलहरी (जगद्गुरु आदि शंकराचार्य - आनन्दलहरी एवं सविस्तार हिन्दी व्याख्या सटीक)

Saundaryalahari of Adi Shankaracharya with Hindi Commentary

by जगद्गुरु आदि शंकराचार्य

DevanagariHindipublished415 pages

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सौंदर्य लहरी १०३
अवतरण होकर वह फिर अपने स्थान पर सर्पाकार साढ़ेतीन कुण्डल
डालकर सो जाती है। इसके दो अर्थ हो सकते हैं। या तो सारी
शक्ति ऊपर उठ जाती है और मूलाधार में शक्ति का कुंडलिनी रूप
में उसके उठने से अभाव हो जाता है, और फिर लौटने पर वह
फिर सो जाती है। दूसरा विकल्प यह हो सकता है कि मूलाधार में
अनन्त शक्ति है, इसलिये वहां पर रहने वाले भंडार में कभी कमी
नहीं होती, जागकर शक्ति ऊपर भी जाती आती रहती है और नीचे
भी बनी रहती है। हमारी समझ में दूसरा विकल्प सत्य जान
पडता है क्योंकि यदि सारी शक्ति सहस्रार में उठ जाय तो उत्थान
के साथ शरीर का आधार न रहने के कारण वह तुरन्त प्रति प्रसब
क्रम से लीन हो जाना चाहिये । प्रपंच का अर्थ शरीर अथवा नाडी
जाल किया जाता है, दोनों पक्ष में एक ही परिणाम समझना
चाहिये । क्योंकि नाडियों द्वारा सारा शरीर पुष्ट होता है, केवल
नाडियां ही नहीं। नाडियों की संख्या प्रश्नोपनिषत् में इस प्रकार
दी गई है।
अत्रैत दे कशतं नाडिनां तासां शतशतमेकैकस्यां द्वासप्ततिः २
प्रतिशाखा नाडी सहस्राणि भवन्ति । प्रश्न० ( ३,६ )
रसाम्नाय महसा के स्थान पर रसाम्नाय महसः पाठान्तर भी
मिलता है। उसका अर्थ नीचे दिया जाता है। तांत्रिक परिभाषा
के अनुसार इस पाठान्तर पद का अर्थ 'अमृत के प्रकाश से चमकने
वाला चन्द्रमा' होने के कारण श्लोक का भावार्थ इस प्रकार होगा
कि शक्ति चन्द्र मण्डल से नीचे उतर आती है, और, अपनी भूमि