सौन्दर्यलहरी (जगद्गुरु आदि शंकराचार्य - आनन्दलहरी एवं सविस्तार हिन्दी व्याख्या सटीक)
Saundaryalahari of Adi Shankaracharya with Hindi Commentary
by जगद्गुरु आदि शंकराचार्य
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Read in contextसौंदर्य लहरी १५
और लहरी से ल हीं लेकर हादि विद्या के तीनों कूटों को ग्रहण
किया जा सकता है । कं * सुख वाचक शब्द है, कं ब्रह्म और
प्राण वाचक भी है देखे छान्दोग्य (४, १०, ५) । इस श्लोक
की अगले श्लोक से संगति करने से हादि विद्या को षट् चक्र वेध
विद्या समझना चाहिये ।
षट् चक्र वेध अर्थात उन्नेय भूमिका ।
[ ९ ]
महीं मूलाधारे कमपि मणिपूरे हुतवहं
स्थितं स्वाधिष्ठाने हृदिमरुतमाकाशमुपरि ।
मनोऽपि भ्रूमध्ये सकलमपि भित्त्वाकुलपथं
सहस्रारे पद्मे सह रहसि पत्या विहरसि ॥
अर्थः— पृथिवी तत्व को मूलाधार में और जल को भी
(मूलाधार में ही) मणिपूर में अग्नितत्व को जिसकी स्थिति
स्वाधिष्ठान में है, हृदय में वायु तत्व को और ऊपर विशुद्ध
चक्र) में आकाश तत्व को, और मन को भी भ्रूमध्य में, इस
प्रकार सकल कुल पथ (शक्ति के मार्ग) का वेध करके तू
सहस्रार पद्म में अपने पति के साथ एकान्त में विहार करती है ।
सं० टि० यहां अन्तर्याग का वर्णन है, कुण्डलिनी शक्ति का
षट चक्र वेध पूर्वक आरोहण बताया गया है ।
- नोटः—कं शिरः सुख वारिषु-विश्वः, सुखशीर्ष जलेषु कं इति मेदिनी ।