सौन्दर्यलहरी (जगद्गुरु आदि शंकराचार्य - आनन्दलहरी एवं सविस्तार हिन्दी व्याख्या सटीक)
Saundaryalahari of Adi Shankaracharya with Hindi Commentary
by जगद्गुरु आदि शंकराचार्य
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Read in context९६ सौन्दर्य लहरी
व्याख्याः— षट् चक्र निरूपण, शिव संहिता और अन्य
ग्रन्थों में बिना मतभेद षट् चक्रों का क्रम इस प्रकार देखने में आता
है कि गुदा के पास पृथिवी तत्व का मूलाधार चक्र है, उपस्थ के
निकट जल तत्व का स्वाधिष्ठान चक्र, नाभि के पास अग्नि तत्व का
मणिपूर चक्र, हृदय के पास वायु तत्व का अनाहत चक्र, कंठ में
आकाश तत्व का विशुद्ध चक्र और भ्रूमध्य के पास मनस्चक्र है,
जिसको आज्ञा चक्र कहते हैं । परन्तु सौन्दर्य लहरी में इस क्रम में
अन्तर दिखता है जिसके अनुसार उपस्थ के पास जल तत्व का मणिपूर
और नाभि में आग्नेय स्वाधिष्ठान चक्र होना चाहिये । तत्वों का
क्रम तो वह ही है परन्तु चक्रों के नामों के क्रम से उपस्थ के चक्र
का नाम मणिपूर और नाभि चक्र का नाम स्वाधिष्ठान प्रतीत होता
है । शंकर भगवत्पाद ने यद्यपि इन दो चक्रों के स्थानों का संकेत
नहीं किया है, परन्तु नाम क्रम से यह ही प्रतीत होता है कि
उनको, उपस्थ वाले चक्र का नाम मणिपूर और नाभि के चक्र का
नाम स्वाधिष्ठान अभिमत था । परन्तु हमारी राय में ऐसा नहीं है,
केवल तत्वों के वेध क्रम में अन्तर है । समयाचार के मतानुसार
उपस्थ वाले चक्र का वेध करना उचित नहीं समझा गया, क्योंकि
इस चक्र के वेध से काम वासना की वृद्धि होकर बज्रौली इत्यादि
क्रियाओं द्वारा ऊर्ध्वरेता होने की सिद्धि प्राप्त की जाती है, जो
कौलाचार को अभीष्ट है. समयाचार को नहीं । इसलिये यहां समया-
चार के अनुसार वेध क्रम दिया गया है । वह इस प्रकार है कि
मूलाधार के वेध द्वारा पृथिवी तत्व का और साथ ही जल तत्व का
भी वहां ही वेध किया जाना चाहिये । ‘अपि’ शब्द का ‘कं’