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सौन्दर्यलहरी (जगद्गुरु आदि शंकराचार्य - आनन्दलहरी एवं सविस्तार हिन्दी व्याख्या सटीक)

सौन्दर्यलहरी (जगद्गुरु आदि शंकराचार्य - आनन्दलहरी एवं सविस्तार हिन्दी व्याख्या सटीक)

Saundaryalahari of Adi Shankaracharya with Hindi Commentary

by जगद्गुरु आदि शंकराचार्य

DevanagariHindipublished415 pages

Page 126 of 415

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Page 126

०६ सौंदर्य लहरी
अपने ईश्वर का निरादर कैसे सहन कर सकती है। प्रजापति से
यहां हमारा अभिप्राय राजे महाराजाओं से नहीं है, हमारे विचार
से तो प्रत्येक गृहस्थ जो बच्चे पैदा करने में ही कुशल है अपनी
प्रजा का छोटा-मोटा प्रजापति ही है। अस्तु। दक्ष प्रजापति के
यज्ञ में सती के देह त्याग के पश्चात शंकर दीर्घकालीन समाधि
लगाकर बैठ गये, और सती ने पर्वतराज हिमालय के घर जन्म
ग्रहण किया। पार्वती ने शिवजी के साथ विवाह करने का हठ
किया और उग्रतप करने लगी। तब देवताओं ने काम देव को
शिवजी की समाधि खोलने के लिये भेजा। कामदेव उपरोक्त सेना
लेकर सशस्त्र शिवजी के स्थान पर पहुंचा, वहां वसंत ऋतु का प्रादुर्भाव
हुआ, मलयागिरि की शीतल मंद सुगंधित वायु चलने लगी, पुष्प
खिल गये जिन पर भौंरे गूंजने लगे और काम देव ने अपने पांचों
बाणो का शिवजी पर प्रहार किया, बस शिवजी की समाधि खुल
गई। उन्होंने सामने कामदेव को एक झाड के पीछे खडा देखा।
उसको अपनी समाधि में विघ्नरूप देखकर शिवजी ने तीसरा ज्ञान
नेत्र खोला और ज्ञानाग्नि से उसे भस्म कर दिया, तब से काम अनंग
हो गया है। उसकी पत्नि रति ने पार्वती से अपना शोक सुनाया,
भवानी ने कृपा कर के उसे फिर जीवित कर दिया। अब वह
अनंग होने पर भी कामियों को अपने प्रभाव से पराजित कर के
सारे जगत का विजेता कहलाता है। प्रभव के लिये मैथुनिक सृष्टि
की आवश्यकता है, और काम के बिना सृष्टि प्रभव संभव नहीं।
भगवान ने भी कहा है।
धर्माविरुद्धो भूतेषु कामोऽस्मि भरतर्षभ ।