सौन्दर्यलहरी (जगद्गुरु आदि शंकराचार्य - आनन्दलहरी एवं सविस्तार हिन्दी व्याख्या सटीक)
Saundaryalahari of Adi Shankaracharya with Hindi Commentary
by जगद्गुरु आदि शंकराचार्य
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Read in contextसौंदर्य लहरी ८५
तथाप्येकः सर्वं हिमगिरिसुते ! कामपि कृपा—
मपांगात्ते लब्ध्वा जगदिदमनंगो विजयते ॥
क्लिष्ट शब्दार्थः— विशिख=बाण, मौर्वी=रस्सी, अपांग=कटाक्ष ।
अर्थः— धनुष्य पुष्पों का बना है, उसकी रस्सी ( ज्या )
भौरों की बनी है, शब्द स्पर्श रूप रस गंध पांच विषय उसके
बाण हैं, बसन्त ऋतु उसका योद्धा सामन्त है, मलयागिरि का
शीतल मंद सुगंधित पवन उसका युद्ध में बैठने का रथ है और
वह स्वयं अनंग (शरीर रहित) है, ऐसा कामदेव ऐसे शस्त्रों को
लेकर सारे जगत को अकेला जीत लेता है । हे हिमगिरि सुते !
यह सामर्थ्य केवल तेरे कटाक्ष से कुछ थोडी सी हीं कृपा प्राप्त
करने का फल है ।
सं. टिंः— इस श्लोक से काम बीज क्लीं का उद्धरण किया
जाता है, काम से क कार, मलय से ल कार, मौर्वी से ई और पौष्पं
से अनुसार लेना चाहिये ।
काम देव अनंग है, शंकर ने उसका देह भस्म कर दिया था ।
काम दहन दक्ष प्रजापति के यज्ञ में अपने पति का अपमान
आख्यान न सहन करने के कारण सती ने अपना देह
योगाग्नि से भस्म कर दिया था । ठीक ही तो
है, शिव द्रोही, मोहासक्त, प्रजा उत्पन्न करने में दक्ष, प्रजापतियों
के देह से पैदा होने वाली वह सती शक्ति उनके सकाम यज्ञों में