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सौन्दर्यलहरी (जगद्गुरु आदि शंकराचार्य - आनन्दलहरी एवं सविस्तार हिन्दी व्याख्या सटीक)

सौन्दर्यलहरी (जगद्गुरु आदि शंकराचार्य - आनन्दलहरी एवं सविस्तार हिन्दी व्याख्या सटीक)

Saundaryalahari of Adi Shankaracharya with Hindi Commentary

by जगद्गुरु आदि शंकराचार्य

DevanagariHindipublished415 pages

Page 127 of 415

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Page 127

सौंदर्य लहरी २७
परन्तु वह समाधि के लिये बहुत बड़ा विघ्न है, बड़े-बड़े
योगियों को भी पथ भ्रष्ट कर देता है। जो शंकर की भी समाधि
खोल सकता है, उसकी दुर्जयता प्रत्यक्ष ही है। काम वासना का
क्षय ज्ञान के उदय होने पर ही होता है, इससे पूर्व नहीं। यह ही
इस आख्यायिका का अभिप्राय है। श्लोक में काम को सारे जगत
का विजेता कहने से, साधकों का लक्ष्य काम वासना के प्रभाव की
ओर आकर्षित करना है, जो भगीरथ प्रयत्नों से भी शमन किया जान
कठिन है। परन्तु कामदेव का सारा सामर्थ्य भगवती के अति
स्वल्प कृपा कटाक्ष का ही तो फल है, इसलिये मुमुक्षु साधकों को
इस दुर्जय शत्रु से बचने के लिये भगवती की ही शरण में जाना
चाहिये। भगवती के ध्यान मात्र से रक्षा हो सकती है।
इसलिये अगले श्लोक में भगवती का ध्यान बताया जाता है:—
[७]
क्वणत्कांचीदामा करिकलभ कुंभस्तन नता
परिक्षीणा मध्ये परिणतशरच्चन्द्र वदना ।
धनुर्बाणान् पाशं सृणिमपि दधानाकरतलैः
पुरस्तादास्तां नः पुरमथितुराहो पुरुषिका ॥
कठिन शब्दों का अर्थ:— कांची=मेखला जो स्त्रियां कटि पर
पहनती हैं। दाम=बंधनी, तगड़ी, कलभ=बच्चा, सृणि=अंकुश