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सौन्दर्यलहरी (जगद्गुरु आदि शंकराचार्य - आनन्दलहरी एवं सविस्तार हिन्दी व्याख्या सटीक)

सौन्दर्यलहरी (जगद्गुरु आदि शंकराचार्य - आनन्दलहरी एवं सविस्तार हिन्दी व्याख्या सटीक)

Saundaryalahari of Adi Shankaracharya with Hindi Commentary

by जगद्गुरु आदि शंकराचार्य

DevanagariHindipublished415 pages

Page 122 of 415

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Page 122

८२ सौंदर्य लहरी
विष रहता है। आधुनिक वैज्ञानिक रहस्योद्घाटन का फल नश्वर
है और उनका प्रयोग जगत के विनाश के लिये ही अधिक किया
जाता है। जहां तक उनका संबंध संसारिक वैभव से है, वह भी
मानव जाति के यद्यपि सुख की मात्रा बढाने की इच्छा से किया
जाता है, परन्तु सुख की वृद्धि के साथ दुःखों की भी वृद्धि करता
है। सुख दुःख दोनों बराबरी के साथी हैं, दोनो एक ही सिक्के
(मुद्रा) के दो पार्श्व हैं, और दोनों का मूल्य उस सिक्के के
बराबर है। अन्तरात्मा में प्रविष्ठ होकर दोनों से मुक्ति पाना ही
आध्यात्म मार्ग का ध्येय है। भगवान की मोहिनी माया
बहिर्मुखी वृत्ति वालों को सदा अमृत पान से वंचित करती रहती
है, यहां तक कि शंकर भगवान की भी समाधि कभी-कभी भंग
हो जाती है। शंकर भगवान ने अमृत पान की इच्छा नहीं की,
वे तो पूर्व से ही अमर थे, और विष को पीकर भी नहीं मरे, तो
भी मोहिनी शक्ति की भ्रांति में कुछ समय के लिये वे भी आ ही
तो गये, यह मोहिनी माया इतनी प्रबल है।
इसलिये मुमुक्षुओं को संसार सागर के रत्नों की प्रेयासक्ति
छोडकर, तितिक्षा सहित दुःखों को सहन करते रहना चाहिये।
आत्मा अमर है, उसे कोई हलाहल मार नहीं सकता।
दुःखों से उद्विग्न न होना और सुखों की स्पृहा का त्याग
करना ही स्थितप्रज्ञता का लक्षण है।
भगवान का भगवती की आराधना कर के मोहिनी रूप से
भगवती के नारी सौन्दर्य का आश्रय लेना ही उसकी आराधना है।