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सौन्दर्यलहरी (जगद्गुरु आदि शंकराचार्य - आनन्दलहरी एवं सविस्तार हिन्दी व्याख्या सटीक)

सौन्दर्यलहरी (जगद्गुरु आदि शंकराचार्य - आनन्दलहरी एवं सविस्तार हिन्दी व्याख्या सटीक)

Saundaryalahari of Adi Shankaracharya with Hindi Commentary

by जगद्गुरु आदि शंकराचार्य

DevanagariHindipublished415 pages

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Page 121

सौंदर्य लहरी ४५
फारसी का दाना ( बुद्धिमान ) शब्द दानव का ही अपभ्रंश दिख
पडता है और फारसी में देव शब्द बुरे अर्थों में ग्रहण किया जाता
हैं । फारसी में देव शब्द विशाल भयंकर व्यक्ति के लिये प्रयुक्त
होता है, जिसे अंग्रेजी में जायैंट giant कहते हैं । परन्तु योरोप
की भाषाओं में देव शब्द ने अपना स्वरूप तद्रूप ही रखा है, जैसे
डिवाइन, ड्यू ( divine, dieu ) । और संस्कृत में दोनों शब्दों
का विपरीत और विरोधी अर्थ दोनों की विपरीत और विरोधी
मनोवृत्तियों और संस्कृतियों पर प्रकाश डालता है ।
आध्यात्मिक दृष्टिकोण से इस गाथा का महत्व समझने योग्य
है, इसलिये उसे समझाना हम उचित समझते हैं । यह संसार एक
महासागर है, जो अनेक रत्नों की खानि है । प्राकृतिक विज्ञान के
विषय ही वे रत्न हैं, जिनको प्राप्त करने के लिये ध्यान रूपी
मथनी से उसका मथन किया जाता है । मथनी को घुमाने के लिये
उसपर एक रस्सी लपेटी जाती है, वहां वासुकी नाग से यह काम
लिया गया था । मन ही वह वासुकी नाग है, जिसने सारे जगत
को डस रखा है । उसका मुख बहिर्मुखी और पूंछ अन्तर्मुखी हैं ।
मुख की ओर असुर बाह्य विषयों की ओर खेंचते हैं, और पूंछ की
ओर से देवगण अन्तरात्मा की ओर खेंचते हैं । वृत्तियां भी आसुरी
और दैवी विख्यात हैं । तब उस मनरूपी रस्सी को तानकर खेंचने
से ध्यानरूपी मथन आरम्भ होता है । आसुरी प्रवृत्ति वाले मनुष्य
बहिर्विषयों पर ध्यान जमाकर भौतिक विज्ञान के रहस्यों का
उद्‌घाटन करते हैं और देवता अन्तरात्मा की आध्यात्मिक खोज के
लिये चिंतन करते हैं । आत्म ज्ञान अमृत है, ओर भौतिक विज्ञान में