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सौन्दर्यलहरी (जगद्गुरु आदि शंकराचार्य - आनन्दलहरी एवं सविस्तार हिन्दी व्याख्या सटीक)

सौन्दर्यलहरी (जगद्गुरु आदि शंकराचार्य - आनन्दलहरी एवं सविस्तार हिन्दी व्याख्या सटीक)

Saundaryalahari of Adi Shankaracharya with Hindi Commentary

by जगद्गुरु आदि शंकराचार्य

DevanagariHindipublished415 pages

Page 123 of 415

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Page 123

सौंदर्य लहरी ८३
हादि विद्या मोक्ष देती है, उसका प्रथम अक्षर ह कार शिव
वाचक है। वैष्णवी विद्या में छः कूट होते हैं, प्रथम तीन कूटों में हादि
विद्या ज्यों की त्यों है, और अन्य तीन कूटों के प्रथम दो कूटों में
ह स के स्थान पर स ह और अन्तिम कूट में स ह पूर्व में जोड़कर
षडाक्षरी कूट मंत्र बनाया गया है। इस प्रकार आधा मंत्र शिव प्रधान
है और आधा शक्ति प्रधान कर दिया गया है।
भगवान का एक नाम हरि है। ह्+अ+र्+इ इनमें हकार शिव
वाचक है, अकार भी ब्रह्मपद वाचक है— अक्षराणामकारोऽस्मि
(गीता)। अकार को हटाकर, र में जो ह्रस्व इकार है उसे दीर्घ कर
देने से ह्रीं पद बनता है। र कार अग्नि का अक्षर होने से
शक्ति वाचक है और दीर्घ ईकार भी, इस प्रकार ह्री (लज्जा) पद
बनता है। उस पर अनुस्वार रूपी प्राण प्रतिष्ठा करने से मोहिनी
माया का रूप बन जाता है। इस प्रक्रिया में पुरुष वाचक अकार
को हटाकर और इकार को दीर्घ कर के स्त्रीलिंग बनाया गया है।
ह्री का अर्थ लज्जा होने के कारण ह्रीं को मोहिनी रूप कहना
यथार्थ ही है।
या देवी सर्व भूतेषुविष्णुमायेति शब्दिता नमस्तस्यैः ३ नमो नमः ॥
काम देव ने कादि विद्या मूल मंत्र की ही उपासना की थी।
काम देव प्रजनन शक्ति का देवता है, और
साध्य सिद्ध ईश्वर की सृष्टि करने की इच्छा से ही उसका
विद्या उदय होता है। भगवान ने भी कहा है कि
धर्म के अविरुद्ध काम मेरा ही रूप है। परन्तु रजोगुण से उत्पन्न होने