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सर्वकोश
सौन्दरनन्द महाकाव्य (महाकवि अश्वघोष - विमला संस्कृत एवं हिन्दी व्याख्या सहित सम्पूर्ण १८ सर्ग)

सौन्दरनन्द महाकाव्य (महाकवि अश्वघोष - विमला संस्कृत एवं हिन्दी व्याख्या सहित सम्पूर्ण १८ सर्ग)

Saundarananda Mahakavya of Ashvaghosha

महाकवि अश्वघोष (व्याख्याकार: आचार्य जगदीशचन्द्र मिश्र) द्वारा

DevanagariHindipublished496 पृष्ठ

पृष्ठ 16, कुल 496 में से

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पृष्ठ 16

( १० )
महाकाव्य— १. बुद्धचरित
२. सौन्दरनन्द
नाटक— १. शारिपुत्र-प्रकरण
२. राष्ट्रपाल
३. उर्वशी-वियोग
४. रूपकावशेष—प्रथम
५. रूपकावशेष—द्वितीय
अश्वघोष की ऊपर वर्णित कृतियां विवादग्रस्त तो है ही, इनमें से असली-
नकली की पहचान एक अलग चिन्त्य एवं शोध का विषय है। किन्तु साहि-
त्यिक कृतियों में निर्विवाद रूप से यह कहा जा सकता है, या प्रामाणिक ढंग से
सम्पुष्ट किया जा सकता है कि बुद्धचरित, सौन्दरनन्द एवं शारिपुत्र-प्रकरण—
ये तीनों ही कृतियां निश्चितरूप से साकेत-निवासी महावादी आर्य भदन्त,
सुवर्णाक्षी-पुत्र अश्वघोष की ही कृतियां हैं। इन तीनों ग्रन्थों में 'बुद्धचरित' एवं
'सौन्दरनन्द' महाकाव्य हैं तथा अन्तिम शारिपुत्र-प्रकरण (शारद्वतीपुत्र-प्रकरण)
एक रूपक है। डॉ० ल्यूडर्स ने सर्वप्रथम इस रूपक की खोज मध्य एशिया के
तुर्फान में की थी। इस नाटक की खोज के क्रम में उसी तालपत्र में डॉ०
ल्यूडर्स को एक खण्डित प्रबोधचन्द्रोदय जैसा एक अन्यापदेशी ( एलेगोरिक )
नाटक है। इस प्रकरण में कीर्त्ति, धृति, शान्ति को मूर्त्तरूप में पात्र बनाकर
कवि ने अपने सैद्धान्तिक मत की सम्पुष्टि की है। दूसरा प्रकरण इसी तरह एक
लघु रूपक है, जिसमें लुच्चे-लफंगे, विट्-विदूषक प्रभृति का जमघट लगा है।
शारिपुत्र-प्रकरण को डॉ० कीथ ने 'हेटेरा ड्रामा' कहा है। इन्हें पढ़कर ऐसा
प्रतीत होता है कि ये ग्रन्थ निश्चय ही अश्वघोष के किसी अपूर्ण कृति के खण्डित
अंश हैं। इससे यह सिद्ध होता है कि अश्वघोष विद्वान् कवि और दार्शनिक तो
थे ही, काव्यशास्त्र के भी मर्मज्ञ ज्ञाता थे। उन्हें बौद्ध भिक्षु के अतिरिक्त
बहुज्ञ एवं शास्त्रज्ञ मानने में विसंवाद नहीं होना चाहिए।
( १ ) बुद्धचरित
'बुद्धचरित' एक नैतिक और आध्यात्मिक स्रोत अधिक है, परन्तु काव्य
कम। यह वह स्रोत है, जो अनन्त काल से प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से सम्पूर्ण
देश में बहता रहा है और कभी-कभी मूर्त्तरूप होकर हमारे सामने आता रहा
है। यह हमारा सौभाग्य है कि हमने ऐसे ही एक मूर्त्तरूप को इस महाकाव्य में
जन्म लेते, हँसते, खेलते और रोते देखा है, जिसने अमरत्व की याद दिलाकर
हमारी सूखी हड्डियों में नई मज्जा डालकर हमारे मृतप्राय शरीर में नये प्राण
फूँके और मुरझाये हुए दिलों में अमरत्व का सौरभयुक्त सुन्द सुमन खिला दिया।
यह सौरभ सुमन है—सम्यक् ज्ञान, सत्य, अहिंसा, प्राणीमात्र के प्रति मैत्रीभाव,
जो केवल इसी देश के लिए नहीं बल्कि प्राणिमात्र के जीवन के लिए आज