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सर्वदर्शनसंग्रह (षोडश दर्शन विमर्श - हिन्दी अनुवाद)

Sarva-Darshana-Sangraha with Hindi Commentary

by माधवाचार्य (विद्यारण्य स्वामी) / पं. उमाशंकर शर्मा ऋषि

DevanagariHindipublished316 pages

प्रस्तावना एवं मंगलाचरण

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SARVA DARSHAN SANGRAH.
OR
AN EPITOME OT THE DIFFERENT
SYSTEMS OF
INDIAN PHYLOSOPHY
BY
MADHAVA CHARYA
TRANSLATED INTO HINDI
BY
PANDIT UDAYA NARAIN SINH S OF
MADHURAPUR DITT MOZAFFERPUR

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॥ श्रीः ॥
सर्वदर्शनसंग्रहः ।
श्रीमन्मध्वाचार्य विरचित ।
मुजफ्फरपुर प्रान्तार्न्तगत मथुरापुरनिवासि पं० श्रीउदयनारायणसिंहकृत
तथा-गोविन्द सूरिविरचित
भाषाटीकासहित
स च
श्रीकृष्णदासात्मज-गङ्गाविष्णुना
स्वकीये " लक्ष्मीवेंकटेश्वर " मुद्रणालये
मुद्रयित्वा प्रकाशितः ।
संवत् १९८२, शकाब्दा १८४७
कल्याण--मुंबई
अस्य ग्रन्थस्य पुनर्मुद्रणाद्यधिकारा यन्त्र धिकारेण
स्वायत्तीकृता

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समर्पण ।
भारतवर्षके गौरवस्तम्भ वैश्यवंशावतंस परमोदार देशत्राता
(संस्कृत) उद्धारक वश्यकुलचूडामणि श्रीमान्
सेठ-खेमराज श्रीकृष्णदासजी महोदय
श्रीमन् !
आपने संस्कृतभाषाकी उन्नति करके हम भारतवासियोका परम उपकार
किया है। ईश्वर-आप ऐसे धर्मरक्षक, दानशील और आर्ष एव आधुनिक
ग्रन्थोंके प्रचार करनेवालोकी सख्या प्रतिदिन बढावे ।
प्राचीन ग्रन्थोमें माध्याचार्य्यविरचित “सर्वदर्शनसंग्रह” नामक दर्शन
ग्रन्थ भारतवर्षमे-भलीभाँति प्रख्यात है-परन्तु ग्रन्थ केवल संस्कृतभाषाम होनेके
कारण सर्वोपयोगी नही होते देखकर मैने इसका भाषाम सरल अनुवाद किया
है, जिससे सब लोगोका उपकार हो ।
इस सानुवाद ग्रन्थको आपके करकमलम अर्पणकर आशा करताहूं किं
आप इसे सुन्दर कागजपर शुद्ध छापकर सम्पूर्ण भारतवर्षमे विज्ञापनद्वारा
सूचना दे प्रचारित करेंगे। जिससे लोगोंका उपकार होगा एव आपकी अतुल
कीर्ति फैलगा ।
स्थान-मधुरा पुर, | आपका-शुभाचिंतक-
जि० मुजफ्फरपुर. | उदयनारायणसिंह शा० ।

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भारतभूमि सब रत्नोंकी प्रसवित्री हे। भारतवर्ष संसारका प्रदर्शनागार कहकर,
भूमण्डलमे प्रसिद्ध है। भारतवर्ष प्रकृतिक प्रियतम निकेतन है । प्रकृति देवीका
विभिन्न भीमकान्त मूर्त्तिका एकत्र समावेश, भारतमे पूर्णरूपसे विकसित दीख पडता
है। या गगनस्पर्शी उत्तुङ्गशृङ्ग समन्वित हिमधवलित पर्वतमाला या उत्ताल तरङ्ग-
मय भीतिजनक नीलवर्ण सलिलपूर्ण समुद्र, या बहुदूर प्रगाहिनी आवर्त्तमयी सुवि-
स्तीर्ण स्रोतस्वती, या वालुका राशिपूर्ण विभीषिकाकी साक्षात् प्रतिकृति मरुभूमि,
या भीषण हिंसक श्वापदसङ्कुल जनमानवविहीन गहन अरण्यानी, या सोवमाउप-
द्विशांभित कोलाहलपूर्ण सुन्दरनगरी, या नानाविध सुगन्ध फल पुष्प विभूषित नयन
श्रुतिकर सुरम्य उपवन, या लतिका परिवेष्टित सुमधुर पक्षिगव निनादित सुविशाल
वृक्षरांजि, या श्यामल शस्य परिशोभित कृषकके यत्न परिरक्षित शस्यक्षेत्र (धान्यका
खेत), या यागमग तपस्वियोंका शान्तिरसास्पद तपोवन—भारतवर्षमें किसीके
दृश्यका अभाव नहीं है। भारतविभिन्न भाषाभाषी विभिन्न धर्मावलम्बी विभिन्न
जातीय लोगोंकी वासभूमि है। भारतवर्ष भिन्न भूमण्डलके किसी प्रदेशमें जाति,
धर्म, भाषा वर्ण, स्वभाव और आचारगत सम्पूर्ण वैसादृश्यका इस प्रकार एकत्र
सन्निवेश परिलक्षित नही होता। संक्षेपसे, भारतवर्षको क्षुद्रायतन पृथिवी वा छोटा
भूमण्डल कहनेसे भी अत्युक्ति दोष नहीं होगा।
भारत जिस प्रकार प्रागुक्त मनोमुग्धकर नैसर्गिक दृश्यादिमे जगत्में सबसे श्रेष्ठ
एक समय धन एव ज्ञानरत्नसे भी भारत उसीप्रकार श्रेष्ठ आसनपर अधिष्ठित था
महामूल्य धनरत्नकी प्रसवित्री कहकर मिसरीय, फिनिसीय, यहूदी, ग्रीक, रोम्यान,
आरब और चेनिक (चिनदेशका) प्रभृति नाना प्राचीन वैदेशिक जाति वाणिज्य
व्यपदेशसे भारतमें आकर, भारतके धनसे अपना २ धनागार (खजाना) परिपूर्ण
किये। भारतका अतुल ऐश्वर्य्यादि दुराशासे विमोहित होकर, नानाजातीय नाना
देशीय, दिग्विजयीगण, भारतको अपन करतलगन करनेके लिये विभिन्नसमयमें
प्रयासी हुए हैं, एवं निदारुण उत्पीडनमे निरीह भारतवासीको उपयुक्त उत्पीड़ित
और भयसन्त्रस्त कर छोडा।
रेशमी ओर विजातीय वैदेशिक दस्युदलके पुन पुन आक्रमणमे भारतवर्ष
.. विशीर्य्यन ओर पदप्रदानत होना एव भारतकी अतुलनीय धनराशि बारम्बार
जाती है बहुतमें वैदेशिक पण्डितगण विभिन्न समयमें धनुकर्णके सिमम्बाट
............ भाषामें भारतकी यशोगीति प्रचारित कर,

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भूमिका । ( ७ )
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भारतकी मनोमुग्धकर प्रतिकृति जगतके सामने रखकर, अपनी २ उदारता ओर
महानुभावताके उदाहरण दिखला गये हैं ।
प्राचीन भारत जिस प्रकार धन रत्नोंमे जगत्में सबसे श्रेष्ठ था । जिस समय
पृथिवीका अधिकांश देश असभ्य आममांसभोजी अरण्याचारी मनुष्यद्वारा परिपूर्ण
था—उस समय भारत सभ्यताके उच्चतम चोटीपर अधिष्ठित होकर, अपने सोभा-
ग्यप्रभासे जगत्‌को मुग्ध ओर पुलकित करता था । जिस समय सम्पूर्ण जगत् घोर
तम अज्ञानान्धकारमे समाच्छन्न था, जिस समय ज्ञान आर सभ्यताका क्षीण आलो-
कभी युरोप आदि महादेशमें शनैः शनै पादविक्षेपण नहीं प्रसृत होता था,—उस
समय भारत विद्या, बुद्धि, ज्ञान और सभ्यताके पूर्ण आलोकसं जगत्‌को आलोकितकर,
अविनश्वर गौरव महिमामे सविशेष गौरवान्वित हुआ था । क्या धर्म, क्या विज्ञान,
क्या दर्शन, क्या गणित, क्या ज्योतिष, क्या भैषज्यतत्त्व, क्या काव्य, क्या पुराण, क्या
शिल्प, क्या वाणिज्य क्या मात्रा, क्या साहित्य, सर्वविध विषयोंमें भारत संसारके शीर्ष
स्थानाय था । भारतका विज्ञान ओर सभ्यता आरव आदिके द्वारा युरोपमें लाया
जाकर युरोपके ज्ञान आर सभ्यताको देदीप्यमान आलोकमे समुज्ज्वल किया ।
ईसवी सन १००० से १७०० पर्य्यन्त भारतके शिष्यस्थानीय अरब, उपदेष्टाके
वरणीय पदमें अधिष्ठित रहकर युरोपमे विद्या और ज्ञानकी सुविमलज्योति विकी-
र्णपूर्वक, युरोपको समुद्भासित किया है ।
भारतका सर्वविध विषयक अभ्युदय जिस प्रकार सबकी अपेक्षा प्राचीन, उसी परि-
माणसे उसका प्राचीनकालीन आख्यानमय इतिहास विद्यमान नही । विभिन्नप्रदे-
शीय राजन्यवर्गकी धारावाहिक वंशावली ओर कीर्त्तिकलाप, एव तदीय आविर्भाव
कालादिका विनिर्धारक, वैज्ञानिक इतिहासका प्रवेश द्वारा स्वरूप, सर्वाङ्गसु दर
आख्यानमय प्राचीन इतिहास—केवल भारतवर्षहीका क्यो, ग्राम, रोम, मिसर, फिने
सिया, एसिरिया, बेबिलन पार्थिया पारस्य ओर चीन प्रभृति किसी देशका सर्वोङ्गीन
भावसे विद्यमान नहीं । काल्पनिक उपन्यास ओर जनश्रुति, सभी देशोंमें अति
प्राचीनकालीन अतीवसाक्षी इतिहासका वरणीय पदपर समासीन रहा है । किन्तु
जो इतिहास अतीतका एकमात्र वर्ष्णीयान् अपक्षपाती साक्षी—जा इतिहास प्रकृत प्र-
स्तावसे समाजका अभ्रान्त उपदेष्टा और परिचालक,—जो इतिहास मानवजीवनका
और मानवसमाजका यथा यथा प्रतिकृति अङ्कितकर, समाजका आविर्भाव उन्नति
और अवनति यथोचित कारण, निर्देशपूर्वक अभ्रान्तरूपसे प्रदर्शन करता—जो
इतिहास सुनिपुण शिल्पविद्‌का सुकौशल विचित्रीत विचित्र फलकी नाई समाजका
यथार्थतत्त्व सुस्पष्टरूपसे प्रकट करता है । सुविमल स्वच्छ दर्पणकी नाई जिसमें
समाजकी यथायथ प्रतिकृति प्रतिभाषित होती है—उस वैज्ञानिक इतिहासका यथो-

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भूमिका।

(८)
पयुक्त उपकरण प्रचुररूपसं सस्कृतसाहित्यमे विद्यमान रहाहै । सस्कृतसाहित्यमें
भारतीय आर्यजातिका जातीय जीवन, जातीय इतिहास, जातीय चरित्र, जातीय
धर्म, जातीय ज्ञान ओर जातीय विद्या, बुद्धि, जातीय रीति, नीति, जोर जातीय
सभ्यता स्वर्णाक्षरमे सुस्पष्टरूपसे लिपिबद्ध हे । भारत किस समय जो अद्वितीय
नाइत्रुर, ग्रोट, जिवनवा मेल्ट आविर्भूत होकर, इन सब बहुमूल्य ऐतिहासिक तथ्य
एकत्र सङ्ग्रहीनकर जगत्को अच्छीप्रकार दिखलाकर विमोहित करेगा सो
भगवान् जाने ।
जो आर्यजाति अतुत्साहस, विक्रम, तेजस्विता और मनस्विता प्रभावसे भूमण्ड
लमें अक्षय कीर्ति लाभकरगयी, जो आर्यजाति एकदा पृथिवीम गन विषयाम
सर्वश्रेष्ठ जाति कहकर परिगणित हुई थी । जो आर्यजाति ज्ञान ओर सभ्यताश
विमल आलोकमें जगत्को उद्भासित कर, जगत्के शिक्षा गुरु बहुसम्माननार्ह वरणीय
पदपर अधिरूढ थी-जिस आर्यजातिके गौरव प्रभावसे भारतवर्षका इतिहासके शी
र्षस्थानमें विराज रहा है । जिस आर्यजातिके वंशधर कहकर हमलोग परपददलित
होकरभी अद्यापि सभ्यसमाजमे ससम्मानसे परिगृहीत होते है, उसी जगतगुरु आ-
र्यजातिके पवित्र कीर्तिपूर्ण इतिहास आज अदृष्टचक्रके आवर्तनसे कीर्ति विलोप
कारी करालकालके विस्मृति कबल (ग्रास) में निहित है। व्यास, वाल्मीकि, कालि-
दास प्रभृति जिस देशके कवि, - पाणिनि, पतञ्जलि प्रभृति जिस देशके वैयाकरण,
कपिल, कणाद और गौतम प्रभृति जिस देशके दार्शनिक - चरक, सुश्रुत आदि
जिस देशके चिकित्सक, - मनु, नारद, वृहस्पति, रघुनन्दन प्रभृति जिम देशके धर्मों-
पदेष्टा-आर्यभट्ट पराशरादि जिस देशका ज्योतिर्वित्-बुद्ध, शङ्कराचार्य, रामानुज
मध्वाचार्य्य आदि जिस देशके धर्म प्रचारक, - मल्लिनाथ, सायनाचार्य आदि जिस
देशक भाष्यकार - अमरसिंह, महेश्वर आदि जिस देशके कोषकार - उस भारत विलु-
प्तप्राय गौरवके उद्धारसाधनार्थ अतीत्साक्षी इतिहासके आश्रय अवलम्बन करनेक
लिये निश्चेष्ट, निष्क्रय परपदानत भारतवासी आर्यसन्तानकी प्रवृत्ति ओर उत्साह
उत्पन्न नही होता । जो जाति पूर्वपुरुषाआके कीर्ति कल्याणका यथायोग्य जादर
ओर सम्मान करना नहीं जानती, जो जाति आत्मगौरव और जात्माभिमानके
मर्म हृदयङ्गम करनेमें समर्थ नहीं होती, उस जातिका अभ्युदय सुदूर परास्त, उस
जातिका पतन ओर परपदानति, अवश्यम्भावी । इसी कारण विधाताने भारतके
भाग्यमें ऐसी दशाविपर्यय अदृष्ट नेमिका इस प्रकार निदारुण परिवर्तन लिख
रक्खा हे एव स्वाधीनताके साथ २ भारतकी विद्या, बुद्धि, ज्ञान, धर्म, कीर्ति, गरिमा,
समस्त विलुप्त किया हे जिम भारत निकटसे शिक्षा लाभकर, युरोपादि सभ्यदेश-

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भूमिका। ९
की इतनी श्रीवृद्धि हुई है,–वही भारत इस समय ज्ञानके लिये युरोपके समीप भि-
क्षा प्रार्थी, वही सुविज्ञ भारत इस समय सूत्रसञ्चालित क्रीडापुत्तलीकी नाई निरव-
च्छिन्न जडभावापन्न वही भारत इससमय हिताहित बोधशून्य चित्तमें युरोपके
अनुकरण करनेम व्यतिव्यस्त है।
अमृतलाभकी आशासे आज युरोपीय पण्डितवर्ग बद्धपरिकर होकर भारतके
अतुलनीय गौरवका निदानभूत सस्कृतसाहित्य समुद्रमन्थन करते हैं–जान भारतके
अतीतज्ञानका अक्षयभण्डार युरोपीय पण्डितोंके अविचलित यत्न, अदम्य उत्साह
और दृढतर अध्यवसायमें, जीवनीशक्तिरहित, निमीलितनेत्र और मोहनिद्राशायित
भारतवासीके सम्मुखमें उपस्थापित रहा है, भारतवासी निश्चेष्टभावसे उस विस्मयच-
क्तित हृदयमे चाहकर देखते हैं। भारतके भूतपूर्व गौरव महिमाके प्रसङ्ग अपने २
देशमें मुक्त कण्ठमे प्रचार पुरःसर, युरोपके मनस्वी पण्डितवर्ग कृतार्थमान्य होते हैं।
मृतसञ्जीवनी विद्याप्रभावसे विलुप्तप्राय मस्कृतसाहित्यको पुनर्जीवितकर, भारतके
निर्जीव और निष्पन्ददेहमें मृदुमन्द वेगसे ये लोग जीवनीशक्तिके तडितालोक
सञ्चालित करते हैं, एव भारतके पूर्वतन अपूर्व कीर्तिकलाप द्वार २ पर डङ्का
बजाकर मोहनिद्रामे चिराभिभूत भारतवासीको जगाकर सचेत करते हैं। पुरा तत्त्वा-
नुसन्धायी शास्त्रज्ञ युरोपीय पण्डितोंको सौ सौ धन्यवाद, हम लोग उनके प्रदर्शित
युक्ति, तर्क, विचार, शक्ति और गवेषणके प्रभावसे, भारतके अनेक अपरिज्ञेयत-
त्त्वार्थपय परिज्ञानसे समर्थ होते हैं।
सस्कृत साहित्यकी नाई अनन्त रत्नराजिपरिपूर्ण साहित्य ससारम दुर्लभ है।
देवभाषा सस्कृतकी नाई मधुरभाषा पृथिवीमें कहीं नहीं है। सस्कृतभाषा और
सस्कृतसाहित्य जगत्में सबसे श्रेष्ठ पदपर अधिष्ठित है। सस्कृत साहित्यके अक्षय-
भण्डारमे क्या २ अमूल्य रत्नराजि सन्निविष्ट है, सो केवल सस्कृतभाषाम ग्रन्थोंके
होनेसे सर्वसाधारणको सम्यक्तया ज्ञात नहीं।
आज मैं उन्हीं सस्कृतके अनेक रत्नोंमेंसे “सर्वदर्शनसग्रह” नामक ग्रन्थके भा-
षानुवादको कर पाठकोंको अवलोकन कराता हू । इस भारतवर्षम बहुत दिनांसे
वैदिकमतके विरुद्ध अनेक बौद्ध, चार्वाक, आर्हत, जैन आदि मत प्रचारित हैं और
प्रतिदिन इन मतोंके अतिरिक्त नये २ सम्प्रदाय वा मत बढते जाते हैं, परन्तु उक्त
बौद्ध, आदिके ग्रन्थोंको सर्व साधारण लोग नहीं देखते इस कारण प्रत्येक मवान २
मतोंका हाल सब नहीं जानते । सस्कृतमें उक्तप्रतोंके सिद्धान्त वर्णनके लिये श्रीम-
ध्वाचार्यजीने “ सर्वदर्शनसग्रह ” नामक ग्रन्थ प्रणयन किया है। जो सस्कृतमं
होनेके कारण सर्व साधारणको सुविख्यात नहीं। पर यह ग्रन्थ ऐसा प्रयोजनीय है

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( १० ) भूमिका ।
कि जितने पण्डित और धर्मके सूक्ष्मभेद जिज्ञासु व्यक्ति हैं। प्रायः सबही इसको
एक एक प्रति रखते हैं। इसमे क्रमसे १ चार्वाकदर्शन, २ बौद्धदर्शन, ३ आर्हतदर्शन,
४ रामानुजदर्शन, ५ पूर्णप्रज्ञदर्शन वा वेदान्तदर्शन, ६ नकुलीशपाशुपतदर्शन, ७ शै
वदर्शन, ८ प्रत्यभिज्ञादर्शन, ९ रसेश्वरदर्शन, १० औलूक्यदर्शन ११ अक्षपाददर्श
न १२ जैमिनीदर्शन १३ पाणिनिदर्शन १४ सांख्यदर्शन १५ पातञ्जलदर्शन इन
पन्द्रह दर्शन वा मत या सम्प्रदाय या सिद्धान्तोंका पूर्णतया वर्णन है। इस एकही
ग्रन्थके पढनेसे उक्त पन्द्रह मतोंके अनेक ग्रन्थोंके सारभागका बोध होता है। दर्शन
शास्त्रोंका अनुवाद करना बहुत कठिन है उसपरभी प्राकृतभाषामे तो ओरभी कठिन
है पर जहांतक सरल करते बना अनुवाद किया है-सज्जन पाठकगण अनुवादके
दोष परित्यागपूर्वक-मूलके आशयको समझकर इस ग्रन्थसे लाभ उठावेंगे तो मेर ।
परिश्रम सफल होगा। इसमें पहिली बार उदयनारायणसिंहने इसका अनुवाद किया
फिर उसमे जो त्रुटि थी उसको बराबर करके दूसरी बार गोविन्दसूरीने अनुवाद
किया है। अलमिति बुद्धिमद्वर्येषु ।

स्थान-मधुरापुर, | प्रथमअनुवादक-
डाक विष्टपुर, | उदयनारायणसिंह,
जिला, मुजफ्फरपुर. | द्वितीयअ.-गोविन्दसूरी.

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॥ श्री ॥
सर्वदर्शनसंग्रहस्य विषयानुक्रमणिका ।
═════════════════════
संख्या विषया.. पृष्ठाङ्काः
१ चार्वाकदर्शनम् .. १
२ बौद्धदर्शनम् .. ११
३ आर्हतदर्शनम् .. ४७
४ रामानुजदर्शनम् .. ८४
५ पूर्णप्रज्ञदर्शनम् .. १२१
६ नकुलीशपाशुपतदर्शनम् .. १४८
७ शैवदर्शनम् .. १७४
८ प्रत्यभिज्ञादर्शनम् .. १६७
९ रसेश्वरदर्शनम् .. १७८
१० औलूक्यदर्शनम् .. १८६
११ अक्षपाददर्शनम् .. २००
१२ जैमिनीयदर्शनम् .. २१६
१३ पाणिनिदर्शनम् .. २३७
१४ सांख्यदर्शनम् .. २५६
१५ पातञ्जलदर्शनम् .. २६६
इति विषयानुक्रमणिका समाप्ता ।

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श्री ।
अथ सर्वदर्शनसंग्रहः ।
भाषाटीकासमेतः ।
अथ चार्वाकदर्शनम् ।
नित्यज्ञानाश्रयं वन्दे निःश्रेयसनिधिं शिवम् ।
येनैव जातं मह्यादि तेनेवेदं सकर्तृकम् ॥ १ ॥
टीकाकारकृत मङ्गलाचरण ।
नत्वा श्री मद्ध्यग्रीवं विद्यारण्यविनिर्मितम् ॥
व्याचष्टे प्राकृतगिरा सर्वदर्शनसङ्ग्रहम् ॥ १ ॥
ग्रन्थसमाप्ति तथा ग्रन्थप्रचारके प्रतिबन्धक दुरितकी शान्तिके लिये करत हुए
मंगलका शिष्यशिक्षाके लिये उल्लेख करते हैं—"नित्यज्ञानेत्यादि" नित्य जे
ज्ञान उसका आश्रय और निश्रेयस जो मोक्ष उसका निधि अर्थात् मोक्षको देने-
वाले शिव (महेश्वर) को मैं वन्दना करता हूँ जिनसे पृथिव्यादि जगत् उत्पन्न है।
अतएव उन्हीं महेश्वरसे यह जगत् सकर्तृक भी है। यहां पर नित्य ज्ञान पदसे
जीवकी व्यावृत्ति की गई आश्रय पदसे ईश्वरको ज्ञानस्वरूपत्वका निषेध किया गया
योगरूढि शिवपदसे प्रतिपादनीय देवताविशेषका कल्याण गुणाकरत्व और 'येनैव'
इत्यादिस 'यतो वा इमानि भूतानि" इत्यादि श्रुतिप्रतिपादित जगत्कारणत्व और
परब्रह्मत्व सूचित किया गया ॥ १ ॥
पारं गतं सकलदर्शनसागराणा-
मात्मोचितार्थचरितार्थितसर्वलोकम् ।
श्रीशार्ङ्गपाणितनयं निखिलागमज्ञं
सर्वज्ञविष्णुगुरुमन्वहमाश्रयेऽहम् ॥ २ ॥
देवता नमस्कारके अनन्तर "यस्य देवे परा भक्तिर्यथा देवे तथा गुरौ" इत्यादि
श्रुतप्रतिपादित गुरुप्रपत्तिरूप मंगलको करते हैं "पारङ्गतेत्यादि"—समस्त दर्शन रूपी
समुद्रके पारङ्गत और आत्मोचित तत्त्वोपदेशसे कृतकृत्य किया संसारको जिन्होंने
तम्भूत शार्ङ्गपाणिके पुत्र सर्वज्ञ विष्णुका मैं आश्रयण करता हूँ ॥ २ ॥

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(२) सर्वदर्शनसंग्रहः। [चार्वाक-
श्रीमत्सायणदुग्धाब्धिकौस्तुभेन महौजसा।
क्रियते माधवार्येण सर्वदर्शनसंग्रहः ॥ ३ ॥
श्रीसायणवंशरूपी क्षीरसमुद्रमें कौस्तुभमणिके समान महाप्रतापी माधवाचार्य
सर्वदर्शन संग्रह ग्रन्थको करते हैं ॥ ३ ॥
पूर्वेषामतिदुस्तराणि सुतरामालोड्य शास्त्राण्यसौ
श्रीमत्सायणमाधवः प्रभुरुपन्यासत्सतं प्रीतये।
दूरोत्सारितमत्सरेण मनसा शृण्वन्तु ते तत्सज्जना
माल्यं कस्य विचित्रपुष्परचितं प्रीत्यै न सञ्जायते ॥ ४ ॥
सायण वंशोद्भव महामान्य श्रीमाधवाचार्यने पूर्वजोंके अतीव दुर्बोध शास्त्रको
सम्यक् प्रकार मथन करके सज्जनोंके प्रमोदार्थ सर्वदर्शन संग्रहका उपन्यास किया सज्जन
गण निर्मत्सरचित्तसे उसका श्रवण करें, क्योंकि विचित्र फूलोंसे बनी हुई माला किस
के मनको आह्लादकारक न होगी ॥ ४ ॥
अथ कथं परमेश्वरस्य निःश्रेयसप्रदत्वमभिधीयते बृहस्पति-
मतानुसारिणा नास्तिकशिरोमणिना चार्वाकेण दूरोत्सारितत्वात्।
दुरुच्छेदं हि चार्वाकस्य चेष्टितम्। प्रायेण सर्वप्राणिनस्तावत्
"यावज्जीवं सुखं जीवेन्नास्ति मृत्योरगोचरः।
भस्मीभूतस्य देहस्य पुनरागमनं कुतः" इति
लोकगाथामनुरुन्धाना नीतिकाsingleमशास्त्रानुसारेणार्थकामावेव
पुरुषार्थौ मन्यमानाः पारलौकिकमर्थमपह्नुवानाश्चार्वाकमत-
मनुवर्त्तमाना एवानुभूयन्ते अत एव तस्य चार्वाकमतस्य लोका-
यतमित्यन्वर्थमपरं नामधेयम् ॥५॥
विषयोन्मुख चित्तोंको देहात्माभिमानादिक स्वाभाविक होनेसे तत्प्रतिपादक
सब मतका निषेध्य होनेके कारण प्रथम चार्वाकमतोपन्यास करते हैं--"अथेत्यादि
परमेश्वरको मोक्षप्रद कैसे कहते हो? क्योंकि सुरगुरुमतानुयायी नास्तिक शिरोमणि
चार्वाकने इसको अत्यन्त दूषित किया है। चार्वाकमतका निराकरण भी अशक्य
है। क्योंकि प्रायः सभी लोग "मृत्युसे कोई भी बच नहीं सकते अतः जब तक जीवे
तब तक सुखपूर्वक जीवे। जलाकर भस्म किये हुये देहकी पुनः उत्पत्ति कहांसे होगी" इस
लोकोक्त्यनुसार नीति शास्त्र तथा कामशास्त्रमे प्रतिपादित काम और अर्थको

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दर्शनम् ] भाषाटीकासमेतः। ( ३ )
रूपार्थ मानकर स्वर्गादि पारलौकिक सुखको निराकरण करनेवाले चार्वाकमतावलम्बी
ही देख पड़ते हैं अत एव चार्वाकका लोकायत यह दूसरा नाम है । लोकप्रसिद्धसे
[अ]तिरिक्त पदार्थ न माननेसे लोकायत कहाता है ॥ ५ ॥
तत्र पृथिव्यादीनि भूतानि चत्वारि तत्त्वानि तेभ्य एव देहाका-
रपरिणतेभ्यः किण्वादिभ्यो मदशक्तिवत् चैतन्यमुपजायते तेषु
विनष्टेषु सत्सु स्वयं विनश्यति । तदिह विज्ञानघन एवैतेभ्यो
भूतेभ्यः समुत्थाय तान्येवानुविनश्यति स न प्रेत्य संज्ञास्ती ति
तत् चैतन्यविशिष्टदेह एवात्मा देहातिरिक्त आत्मनि प्रमाणा-
भावात् प्रत्यक्षैकप्रमाणवादितया अनुमानादेरनङ्गीकारेण प्रामा-
ण्याभावात् ॥ ६ ॥
रा : उनके मतमें पृथिवी, जल, तेज, वायु, चार ही तत्त्व हैं । देहरूपसे परिणत इन्ही
चारोंसे चैतन्य उत्पन्न होता है । जैसे मादक द्रव्योंसे मदशक्ति उत्पन्न होती है प्रत्येक
में अविद्यमान भी मदशक्ति समुदायसे उत्पन्न होती है । इन तत्त्वोंका नाश होनेपर
वह आत्मा स्वयं नष्ट होता है । “विज्ञानस्वरूप आत्मा इन तत्त्वोंसे उत्पन्न होकर
उसीमें नष्ट होता है मरनेपर परलोकमें कोई नाम नही रहतो । चैतन्यविशिष्ट देहसे
अतिरिक्त आत्मामें कोई प्रमाण नहीं । केवल प्रत्यक्ष ही प्रमाण है । अनुमानादिके
प्रामाण्यमें कोई युक्ति नहीं ॥ ६ ॥
( अङ्गनालिङ्गनादिजन्यं सुखमेव पुरुषार्थः । न चास्य दुःखसं-
भिन्नतया पुरुषार्थत्वमेव नास्तीति मन्तव्यम् । अवर्जनीयतया
प्राप्तस्य दुःखस्य परिहारेण सुखमात्रस्यैव भोक्तव्यत्वात् । तद्यथा
मत्स्यार्थी सशल्कान् सकण्टकान् मत्स्यानुपादत्ते स यावदादेयं
तावदादाय निवर्त्तते । यथा वा धान्यार्थी सपलालानि धान्या-
न्याहरति स यावदादेयं तावदादाय निवर्त्तते । तस्माद्दुःखभ-
यान्नानुकूलवेदनीयं सुख त्यक्तुमुचितम् । नहि मृगाः सन्तीति
शालयो नोप्यन्ते, नहि भिक्षुकाः सन्तीति स्थाल्यो नाधिश्री-
यन्ते यदि कश्चिद् भीरुदृष्ट सुखं त्यजेत् तर्हि स पशुवन्मूर्खो
भवेत् ॥ ७ ॥ )

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(२) सर्वदर्शनसंग्रहः। [ चार्वाक-
श्रीमत्सायणदुग्धाब्धिकौस्तुभेन महौजसा ।
क्रियते माधवार्येण सर्वदर्शनसंग्रहः ॥ ३ ॥
श्रीसायणवंशरूपी क्षीरसमुद्रमें कौस्तुभमणिके समान महाप्रतापी माधवाचार्य
सर्वदर्शन संग्रह ग्रन्थको करते हैं ॥ ३ ॥
पूर्वेषामतिदुस्तराणि सुतरामालोड्य शास्त्राण्यसौ
श्रीमत्सायणमाधवः प्रभुरुपन्यास्थत्सतां प्रीतये ।
दूरोत्सारितमत्सरेण मनसा शृण्वन्तु ते तत्सज्जना
माल्यं कस्य विचित्रपुष्परचितं प्रीत्यै न सञ्जायते ॥ ४ ॥
सायण वंशोद्भव महामान्य श्रीमाधवाचार्यने पूर्वजोके अतीव दुर्बोध शास्त्रको
सम्यक् प्रकार मथन करके सज्जनोंके प्रमोदार्थ सर्वदर्शन संग्रहका उपन्यास किया सज्ज-
नगण निर्मत्सरचित्तसे उसका श्रवण करे, क्योंकि विचित्र फूलोंसे बनी हुई माला किस
के मनको आह्लादकारक न होगी ॥ ४ ॥
अथ कथं परमेश्वरस्य निःश्रेयसप्रदत्वमभिधीयते बृहस्पति-
मतानुसारिणा नास्तिकशिरोमणिना चार्वाकेण दूरोत्सारितत्वात् ।
दुरुच्छेदं हि चार्वाकस्य चेष्टितम् । प्रायेण सर्वप्राणिनस्तावत्
“यावज्जीवं सुखं जीवेन्नास्ति मृत्योरगोचरः ।
भस्मीभूतस्य देहस्य पुनरागमनं कुतः” इति
लोकगाथामनुरुन्धाना नीतिकामशास्त्रानुसारेणार्थकामावेव
पुरुषार्थौ मन्यमानाः पारलौकिकमर्थमपह्नुवानाश्चार्वाकमत-
मनुवर्त्तमाना एवानुभूयन्ते अत एव तस्य चार्वाकमतस्य लोका-
यतमित्यन्वर्थमपरं नामधेयम् ॥ ५ ॥
विषयोन्मुख चित्तोंको देहात्माभिमानादिक स्वाभाविक होनेसे तत्प्रतिपादक
सब मतका निषेध होनेके कारण प्रथम चार्वाकमतोपन्यास करते हैं--“अथेत्या-
परमेश्वरको मोक्षप्रद कैसे कहते हो ? क्योंकि सुरगुरुमतानुयायी नास्तिक शिरोमणि
चार्वाकने इसको अत्यन्त दूषित किया है । चार्वाकमतका निराकरण भी अशक्य
है । क्योंकि प्रायः सभी लोग “मृत्युसे कोई भी बच नहीं सकते अतः जब तक जीवे
तन तक सुखपूर्वक जीवे । जलाकर भस्म किये हुये देहकी पुन. उत्पत्ति कहासे होगी ”
इस लोकोक्त्यनुसार नीति शास्त्र तथा कामशास्त्रमें प्रतिपादित काम और अर्थको

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र्शनम् ] भाषाटीकासमेतः । ( ३ )
पार्थ मानकर स्वर्गादि पारलौकिक सुखको निराकरण करनेवाले चार्वाकमतावलम्बी
देख पडते हैं अत एव चार्वाकका लोकायत यह दूसरा नाम है । लोकप्रसिद्धसे
तिरिक्त पदार्थ न माननेसे लोकायत कहाता है ॥ ५ ॥
तत्र पृथिव्यादीनि भूतानि चत्वारि तत्त्वानि तेभ्य एव देहाका
रपरिणतेभ्यः किण्वादिभ्यो मदशक्तिवत् चैतन्यमुपजायते तेषु
विनष्टेषु सत्सु स्वयं विनश्यति। तदिह विज्ञानघन एवैतेभ्यो
भूतेभ्यः समुत्थाय तान्येवानुविनश्यति स न प्रेत्य सञ्ज्ञास्ती ति
तत् चैतन्यविशिष्टदेह एवात्मा देहातिरिक्त आत्मनि प्रमाणा-
भावात् प्रत्यक्षैकप्रमाणवादितया अनुमानादेरनङ्गीकारेण प्रामा-
ण्याभावात् ॥ ६ ॥
उनके मतमें पृथिवी, जल, तेज, वायु, चार ही तत्त्व हैं । देहरूपसे परिणत इन्हीं
रोंसे चैतन्य उत्पन्न होता है । जैसे मादक द्रव्योंसे मदशक्ति उत्पन्न होती है प्रत्येक
में अविद्यमान भी मदशक्ति समुदायसे उत्पन्न होती है । इन तत्त्वोंका नाश होनेपर
व आत्मा स्वयं नष्ट होता है । “विज्ञानस्वरूप आत्मा इन तत्त्वोंसे उत्पन्न होकर
सर्मे नष्ट होता है मरनेपर परलोकमें कोई नाम नहीं रहता । चैतन्यविशिष्ट देहसे
अतिरिक्त आत्मामें कोई प्रमाण नहीं । केवल प्रत्यक्ष ही प्रमाण है । अनुमानादिके
प्रामाण्यमें कोई युक्ति नहीं ॥ ६ ॥
अङ्गनालिङ्गनादिजन्य सुखमेव पुरुषार्थः । न चास्य दुःखसं-
भिन्नतया पुरुषार्थत्वमेव नास्तीति मन्तव्यम् । अवर्जनीयतया
प्राप्तस्य दुःखस्य परिहारेण सुखमात्रस्यैव भोक्तव्यत्वात् । तद्यथा
मत्स्यार्थी सशल्कान् सकण्टकान् मत्स्यानुपादत्ते स यावदादेयं
तावदादाय निवर्त्तते । यथा वा धान्यार्थी सपलालानि धान्या-
न्याहरति स यावदादेयं तावदादाय निवर्त्तते । तस्माद्दुःखभ-
यान्नानुकूलवेदनीयं सुखं त्यक्तुमुचितम् । नहि मृगाः सन्तीति
शालयो नोप्यन्ते, नहि भिक्षुकाः सन्तीति स्थाल्यो नाधिश्री-
यन्ते यदि कश्चिद् भीरुदृष्ट सुखं त्यजेत् तर्हि स ५
भवेत् ॥ ७ ॥

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[ चार्वाक-
सर्वदर्शनसंग्रहः।
(४)
अङ्गनालिङ्गनादि जन्य सुख ही पुरुषार्थ है । यदि कहो तादृश सुख दुःखाभि-
श्रित होनेसे पुरुषार्थ नही हो सकता यह भी नही, क्योंकि नान्तरीकतया अनिवार्य-
रूपसे प्राप्त दुःखको परित्याग कर सुखमात्रका ग्रहण होता है । जिस प्रकार मत्स्यार्थी
काँटा और छिलका सहित मत्स्योको पकडते हैं परन्तु जितना अंश उपयुक्त हो उतना
लेकर बाकीको छोड देते हैं अथवा जैसे धान्यार्थी सपलाल धान्यको लाकर अपेक्षित
अन्नमात्रको ग्रहण कर बाकी पलालको छोड देते हैं । अत दुःखके डरसे सुखको
छोड देना उचित नही मृगके डरसे धान ही न बोये जाँय, भिक्षुकोंके भयसे पाक भी न
किया जाय ऐसा नही होता । यदि कोई उत्पौक हुए सुखको त्याग दे तो उसको पशुके
समान मूर्ख समझना चाहिए ॥ ७ ॥
तदुक्तम्-“त्याज्यं सुखं विषयसङ्गमजन्म पुंसां
दुःखोपसृष्टमिति मूर्खविचारणेषा ।
व्रीहीन् जिहासति सितोत्तमतण्डुलाढ्यान्
को नाम भोस्तुषकणोपहितान् हितार्थी” ॥ ८ तस्येति-
कहा भी है-विषयभोगसे जायमान सुख दुःखमिश्रित होनेसे त्याज्य हेतद्
का विचार है कौन विचारशील तुषकणोसे आच्छादित होनेके कारण उत्तम
तण्डुलोंसे युक्त धान्यको छोड देगा ॥ ८ ॥
ननु पारलौकिकसुखाभावे बहुवित्तव्ययशरीरायाससाध्ये अग्नि-
होत्रादौ विद्यावृद्धाः कथं प्रवर्त्तिष्यन्ते इति चेत् । तदपि न प्रमा-
णकोटिं प्रवेष्टुमीष्टे अनृतव्याघातपुनरुक्तदोषैर्दूषिततया वैदिकम्म-
न्यैरेव धूर्तवकै परस्परं कर्म्मकाण्डप्रामाण्यवादिभिर्ज्ञानकाण्डस्य
ज्ञानकाण्डप्रामाण्यवादिभिः कर्म्मकाण्डस्य च प्रतिक्षिप्तत्वेन त्रय्या
धूर्त्तप्रलापमात्रत्वेन अग्निहोत्रादेर्जीविकामात्रप्रयोजनत्वात्
तथा चाभाणक -“अग्निहोत्रं त्रयो वेदास्त्रिदण्डं भस्मगुण्ठनम् ।
बुद्धिपौरुषहीनानां जीविकेति बृहस्पतिः” ॥ ९ ॥
यदि पारलौकिक स्वर्गादि सुख नही हो तो बहुत धन व्यय एवं शरीरश्रमसा
अग्निहोत्रादि कर्मोमे बडे २ विद्वान् लोग क्यो प्रवृत्त होते हैं यह भी प्रमाण
वीमें प्रवेश नहीं कर सकता क्योंकि वैदिकाभिमानी धूताने ही परस्पर अन
घात, पुनरुक्त, दोषोंमे दूषित किया है जैसे ज्ञानकाण्डप्रामाण्यवादियोंने कर्मक
और कर्मकाण्डमाम्...पादियाने ज्ञानकाण्डको दूषित किया है । नृगूपत्रु

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दर्शनम् ] . भाषाटीकासमेतः । ( ५ )
त्मक वेदत्रय धूर्तोके कल्पित हैं । अग्निहोत्रादिक भी जीविकाके लिये है ॥ अग्निहोत्र,
वेदत्रय, सन्यास और भस्मलेपन यह सब बुद्धि और पराक्रमसे हीनोंकी जीविकामात्र
है। यह बृहस्पति का कहना है ॥ ९ ॥
अत एव कण्टकादिजन्यं दुःखमेव नरकं लोकसिद्धो राजा
परमेश्वर देहोच्छेदो मोक्षः। देहात्मवादे च 'कृशोऽहं कृष्णोऽहम्'
इत्यादि सामानाधिकरण्योपपत्तिः । 'मम शरीरम्' इति व्यव-
हारो 'राहोः शिरः' इत्यादिवदौपचारिकः॥ १० ॥
संक्षेपतः इस मतका सिद्धांत यह है कि कण्टकादिजन्य दुःख ही नरक है,
लोकप्रसिद्ध राजा ही ईश्वर है, देहोच्छेद अर्थात् मरण ही मुक्ति है, देहात्मवादमे ही मैं
कृश हूं स्थूल हूं श्याम हूं इत्यादि सामानाधिकरण्य उपपन्न होता है ॥ सामानाधि-
करण्य उसको कहते हैं कि जो विभिन्न धर्म्मविशिष्ट एकधर्मीका वाचक हो देहात्मवादमें
मेरा देह इत्यादि व्यवहार भी राहुका शिर, शिलापुत्रकका शरीर इत्यादिवत् औप-
चारिक हो सकता है ॥ १० ॥
तदेतत् सर्वं समग्राहि-
“अत्र चत्वारि भूतानि भूमिवार्यनलानिलाः
चतुर्भ्यः खलुभूतेभ्यश्चैतन्यमुपजायते ॥
किण्वादिभ्यः समेतेभ्यो द्रव्येभ्यो मदशक्तिवत् ।
अहं स्थूल कृशोऽस्मीति सामानाधिकरण्यतः ॥
देहः स्थौल्यादियोगाच्चस एवात्मा न चापरः ।
मम देहोऽयमित्युक्तिः सम्भवेदौपचारिकी” इति ॥ ११॥
उक्त बातोंको चार्वाकोंने संग्रह करके कहा है- पृथिव्यादि चार ही तत्त्व हैं और
ही तत्त्वोंमें मादक द्रव्यसमुदायसे मदशक्तिवत् चैतन्य उत्पन्न होता है । मैं
ल हूं, कृश हूं इत्यादि देहाभेद व्यवहारसे देह ही आत्मा है। मेरा देह इत्यादि व्य-
ार भी उपचारसे होता है ॥ ११ ॥
स्यादेतत्-स्यादेष मनोरथो यद्यनुमानादेः प्रामाण्यं न स्यात्
अस्ति च प्रामाण्यं कथमन्यथा धूमोपलम्भादनन्तरं धूमध्वजे
प्रेक्षावतां प्रवृत्तिरुपपद्येत । नद्यास्तीरे फलानि सन्तीति वचन-
श्रवणसमनन्तर फलार्थिनां नदीतीरे प्रवृत्तिरिति । तदेतन्मनो-