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सर्वकोश
सर्वदर्शनसंग्रह (षोडश दर्शन विमर्श - हिन्दी अनुवाद)

सर्वदर्शनसंग्रह (षोडश दर्शन विमर्श - हिन्दी अनुवाद)

Sarva-Darshana-Sangraha with Hindi Commentary

माधवाचार्य (विद्यारण्य स्वामी) / पं. उमाशंकर शर्मा ऋषि द्वारा

DevanagariHindipublished316 पृष्ठ

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पृष्ठ 17

(२) सर्वदर्शनसंग्रहः। [ चार्वाक-
श्रीमत्सायणदुग्धाब्धिकौस्तुभेन महौजसा ।
क्रियते माधवार्येण सर्वदर्शनसंग्रहः ॥ ३ ॥
श्रीसायणवंशरूपी क्षीरसमुद्रमें कौस्तुभमणिके समान महाप्रतापी माधवाचार्य
सर्वदर्शन संग्रह ग्रन्थको करते हैं ॥ ३ ॥
पूर्वेषामतिदुस्तराणि सुतरामालोड्य शास्त्राण्यसौ
श्रीमत्सायणमाधवः प्रभुरुपन्यास्थत्सतां प्रीतये ।
दूरोत्सारितमत्सरेण मनसा शृण्वन्तु ते तत्सज्जना
माल्यं कस्य विचित्रपुष्परचितं प्रीत्यै न सञ्जायते ॥ ४ ॥
सायण वंशोद्भव महामान्य श्रीमाधवाचार्यने पूर्वजोके अतीव दुर्बोध शास्त्रको
सम्यक् प्रकार मथन करके सज्जनोंके प्रमोदार्थ सर्वदर्शन संग्रहका उपन्यास किया सज्ज-
नगण निर्मत्सरचित्तसे उसका श्रवण करे, क्योंकि विचित्र फूलोंसे बनी हुई माला किस
के मनको आह्लादकारक न होगी ॥ ४ ॥
अथ कथं परमेश्वरस्य निःश्रेयसप्रदत्वमभिधीयते बृहस्पति-
मतानुसारिणा नास्तिकशिरोमणिना चार्वाकेण दूरोत्सारितत्वात् ।
दुरुच्छेदं हि चार्वाकस्य चेष्टितम् । प्रायेण सर्वप्राणिनस्तावत्
“यावज्जीवं सुखं जीवेन्नास्ति मृत्योरगोचरः ।
भस्मीभूतस्य देहस्य पुनरागमनं कुतः” इति
लोकगाथामनुरुन्धाना नीतिकामशास्त्रानुसारेणार्थकामावेव
पुरुषार्थौ मन्यमानाः पारलौकिकमर्थमपह्नुवानाश्चार्वाकमत-
मनुवर्त्तमाना एवानुभूयन्ते अत एव तस्य चार्वाकमतस्य लोका-
यतमित्यन्वर्थमपरं नामधेयम् ॥ ५ ॥
विषयोन्मुख चित्तोंको देहात्माभिमानादिक स्वाभाविक होनेसे तत्प्रतिपादक
सब मतका निषेध होनेके कारण प्रथम चार्वाकमतोपन्यास करते हैं--“अथेत्या-
परमेश्वरको मोक्षप्रद कैसे कहते हो ? क्योंकि सुरगुरुमतानुयायी नास्तिक शिरोमणि
चार्वाकने इसको अत्यन्त दूषित किया है । चार्वाकमतका निराकरण भी अशक्य
है । क्योंकि प्रायः सभी लोग “मृत्युसे कोई भी बच नहीं सकते अतः जब तक जीवे
तन तक सुखपूर्वक जीवे । जलाकर भस्म किये हुये देहकी पुन. उत्पत्ति कहासे होगी ”
इस लोकोक्त्यनुसार नीति शास्त्र तथा कामशास्त्रमें प्रतिपादित काम और अर्थको