सांख्य दर्शन (सांख्य-प्रवचन सूत्र व हिन्दी व्याख्या सहित)
Sankhya Darshana with Hindi Commentary
by महर्षि कपिल
Source: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (origin)
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Read in contextतीनों दर्शनोंके तात्पर्यका उद्घाटन । ( ५६ )
के शरीरमें प्रवेश कर लेते हैं। उसी समयसे फिर सब जीवात्मा
अपने २ धर्म व अधर्मके अनुसार सुख दुःखोंको भोगने लगते हैं
न्या० वै० सोक्त ।
जब पुरुष ईश्वरार्पण बुद्धिसे निषिद्ध वर्जित कर्मोंका
अनुष्ठान करता है, जिससे कि-फिर कोई नवीन सुख दुःखका
बीज उसके आत्मा में उत्पन्न नहीं होता, और पूर्व संचित
पाप पुण्यकी थैली भोगते २ खाली हो जाती है, उसी समय
जीव का बन्धन टूट जाता है अर्थात् उसके पीछे जो परमाणु
रूप मनका अदृष्टकारित सम्बन्ध लगा हुआ है, टूट जाता है,
और जीव मुक्त हो जाता है। उस समय मन भी जड़ता को
धारण कर लेता है आत्मा के साथ किसी प्रकारके कार्य करने
की उसमें शक्ति नहीं रहती ।
सांख्य, न्याय और वैशेषिक
तीनों दर्शनोंकेतात्पर्यका उद्घाटन
तीनों दर्शनोंके मतमें आत्मा नाना और विभुहै, अन्य२
आत्मा के विशेषणों में न्याय और वैशेषिक दर्शन दोनों समान
विचार हैं, किन्तु सांख्य प्रायः उनसे पृथक् मार्ग पर चलता है।
जिन बातोंमें उक्त दोनों पक्ष विभिन्न मत हैं, उनके सम्बन्ध
में पहिले लिखा जा चुका है, अब उनके तुल्य सिद्धान्तों के
अवलम्बन पर सम्मिलित भाव प्रकाशित किया जाता है।
ये तीनोंही दर्शनकार आत्मा को संख्यासे अनन्त और
परिमाण से परम महान् समझते हैं। जितने जीवात्मा हैं,
सभी आकाश तथा परमात्मा के समान व्यापक हैं, जिस प्रकार
आकाश का अनुमान मात्र होता है, उसी प्रकार शुद्ध आत्मा
भी अनुमान से ही निश्चित होता है, किन्तु प्रत्यक्ष प्रमाण का
गोचर नहीं है । व्यापक होनेसे आत्मा चल फिर नहीं सकता