सांख्य दर्शन (सांख्य-प्रवचन सूत्र व हिन्दी व्याख्या सहित)
Sankhya Darshana with Hindi Commentary
by महर्षि कपिल
Source: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (origin)
Page 75 of 81
Read in context(६०) तीनों दर्शनोंके तात्पर्यका उद्घाटन ।
जो कुछ चलना फिरना होता है, वह सब शरीरों का है। मृत्यु
के समय में भी आत्मा शरीर को छोड़ नहीं सकता । शरीर
का छोड़ना तथा ग्रहण करना मन या सूक्ष्म शरीर का कार्य है
स्वर्ग और नरकं में मन या लिङ्ग शरीर ही आता जाता रहता
है, आत्मा व्यापक होनेसे सदा ही स्वर्ग व नरक आदि सकल
स्थानों में रहता ही है, सर्व काल में सब स्थानों में रहने पर
भी सब स्थानों के सुख दुःखों को नहीं भोगता, किन्तु जहां उस
का मन या लिङ्ग शरीर चला जाता है, वहीं सुख दुःखों को
भोगता है सब स्थानों मे आत्मा अज्ञान शून्य रहता है, किन्तु
उसका मन जितने आत्मा को आकलित या व्याप्त कर लेता
है उतने ही आत्म देश में ज्ञान रहता है मन परिमाण से
अत्यन्त सूक्ष्म अथवा परमाणु रूप है वह कुछ बड़ा नहीं है उस
परमाणु रूप मन के देश में ही जहां वह रहे या चला जाय,
वहीं जितना आत्मा परमाणु परिमाण है, सुख दुःखों का अनु-
भव करता है, उस स्थान के अतिरिक्त अन्य सब विश्वव्यापी
आत्मा सदा मुक्त तथा जड़ रूपसे अविशिष्ट रहता है, मानों
एक मच्छर ने महाकाश को बद्ध कर रक्खा है, मच्छरके भीतर
महाकाश के एक सूक्ष्म भाग के आजाने से महाकाश बद्ध हो
जाता है, किन्तु उसके अतिरिक्त उस जगद्व्यापी महाकाशके
मुक्त महाभाग से मुक्त नहीं, ऐसी ही सूक्ष्म शरीर या मन के
कारण विभु आत्मा की शोच्य अवस्था है, संसारावस्था में
जीवात्मा का यह वृत्तान्त है, मुक्तावस्था में समीप २ तीनों
ही दर्शनों के मतमें संसारावस्था के समान जीवात्मा का (१)
मन से संयोग नहीं छूटता, क्यों कि नित्य और परमाणु रूप
होने से वह विभु आत्मा से बाहर जावे भी कहां? केवल उस
के अदृष्टकृत सम्बन्ध का अभाव मात्र होता है प्रयोजन यह
१-सांख्य के सत्कार्यवाद के अनुसार अव्यक्त रूपमें है ।