सांख्य दर्शन (सांख्य-प्रवचन सूत्र व हिन्दी व्याख्या सहित)
Sankhya Darshana with Hindi Commentary
by महर्षि कपिल
Source: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (origin)
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Read in context( ५८ ) सांख्य, न्याय और वैशेषिक दर्शनका जीवात्मा
मरणानन्तर मन में क्रिया तथा अतिवाहित शरीर की
उत्पत्ति अदृष्ट वश से होती है । जीवनकाल में पहिले आत्मा
में कोई प्रकार की इच्छा या द्वेष उत्पन्न होकर, प्रयत्न उत्प
न्न होता है, उसकी सहायताकी लिये हुए आत्मा और मनका
संयोग होता है, उसी से फिर नेत्र तथा श्रोत्र आदि इन्द्रियों
के साथ संयोग होने के लिये मन में क्रिया होती है, क्यों कि-
जैसा अभिप्राय होता है, उसी के अनुसार अन्य इन्द्रियों से
विषयों, (रूपरसादिकों) का ज्ञान होता है । स्वतंत्रता से
कोई इन्द्रिय किसी वस्तु के ज्ञानको उत्पन्न नहीं कर सकता
इसी लिये आत्मा और चक्षुः आदि इन्द्रियों के बीच में मन
के सम्बन्ध की कल्पना करनी पड़ती है । क्यों कि-आत्मा
व्यापक होने से सदा ही सब इन्द्रियों से सम्बन्ध रखता है,
यदि बीच में कोई अन्य वस्तु न हो तो सब इन्द्रियोंसे दर्शन
आस्वादन आदि कार्य एक ही काल में हो जावें, किन्तु ऐसा
होता नहीं है ॥
न्याय-वैशेषिक दोनों दर्शनों में मनके अतिरिक्त अन्य
चक्षु आदि सब इन्द्रिय शरीर के साथ ही उत्पन्न होते हैं,
और उसके नाशके साथ नष्ट होजाते हैं । केवल मनही आत्मा
का निरन्तर साथदेता रहताहै जब तककि-महाप्रलय न हो ।
महाप्रलयके अनन्तर फिर सृष्टिके आरम्भसे पहिले निस्त-
ब्ध (निश्चेष्ट) जैसा रहता है, जब सृष्टि का आरम्भ काल
आताहै अदृष्ट (धर्म, अधर्म) के अनुसार उसमें क्रिया होने
लगती है, जिसके कारण वह उस समयमें नवीन उत्पन्न हुए
शरीरमें जा प्रवेश करताहै । सृष्टिके आरम्भकालमें सब आत्मा-
ओंके लिए जैसा २ अदृष्ट हो अलग २ शरीर उत्पन्न हो जाते
हैं, और प्रत्येक आत्माओंके जो भिन्न २ मन हैं, वे उस उस