सांख्य दर्शन (सांख्य-प्रवचन सूत्र व हिन्दी व्याख्या सहित)
Sankhya Darshana with Hindi Commentary
by महर्षि कपिल
Source: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (origin)
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Read in contextहिन्दी सांख्यदर्शन (५१)
प्राप्ते शरीरभेदे चरितार्थत्वात् प्रधानविनिवृत्तौ ।
ऐकान्तिकमात्यन्तिकमुभयं कैवल्यमाप्नोति ॥६८॥
संचित सम्पूर्ण कर्माशयों (धर्म अधर्मों) का तत्वज्ञानरूप
अग्नि से बीजपना (अंकुर उत्पन्न करने की शक्ति) दग्ध हो
गया, तथा प्रारब्ध (जिनका भोग वर्त्तमान है या जिनका फल
स्वरूप यह वर्त्तमान शरीर है) कर्मों का भी उपभोग होचुका
इससे शरीर (इस अन्तिम शरीर) का भेद (नाश) प्राप्त होते
ही प्रधान को कृतकार्य होजाने से वह भी निवृत्त होजाता है,
तथा पुरुष भी उस समय ऐकान्तिक (अवश्यंभावी) और आ-
त्यन्तिक (अविनाशी) कैवल्य (मोक्ष) को प्राप्त होजाता है,
जिसका प्रस्ताव ग्रन्थ के आरम्भ में “एकान्तात्यन्ततोऽभावात्”
वाक्य से किया गया था ॥६८॥
शास्त्र का आविष्कार ।
पुरुषार्थज्ञानमिदं गुह्यं परमर्षिणा समाख्यातम् ।
स्थित्युत्पत्तिप्रलया श्चिन्त्यन्ते यत्र भूतानाम् ॥६९॥
यह गुह्य (गुफामें रहने वाला जैसा) या स्थूल बुद्धि वालों
को दुर्ज्ञेय पुरुषार्थ-ज्ञान (सांख्यशास्त्र) परमर्षि कपिलदेवने
प्रथम समीचीन रीति से आख्यान किया था, जिसमें ज्ञान के
निमित्तभूतों (पदार्थों) की स्थिति उत्पत्तिऔर प्रलय चिन्तन
किये जाते हैं ॥६६॥
एतत्पवित्रमग्र्यं मुनिरासुरयेऽनुकम्पयाप्रददौ ।
आसुरिरपि पञ्चशिखायतेनच बहुधाकृतंतन्त्रम् ७०
इस पवित्र श्रेष्ठ शास्त्र को मुनि कपिलदेवने आसुरिनाम
अपने शिष्य के लिये अनुकम्पा (दया) से प्रदान किया था,