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सांख्य दर्शन (सांख्य-प्रवचन सूत्र व हिन्दी व्याख्या सहित)

सांख्य दर्शन (सांख्य-प्रवचन सूत्र व हिन्दी व्याख्या सहित)

Sankhya Darshana with Hindi Commentary

by महर्षि कपिल

Source: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (origin)

DevanagariSanskritpublished81 pages

Page 65 of 81

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( ५० ) हिन्दी सांख्य दर्शन
सतिसंयोगेऽपितयोःप्रयोजनंनास्ति सर्गस्य ६६
“मैं इसे देख चुका” इस बुद्धि से उन दोनों में एक
अर्थात् पुरुष प्रकृतिसे उपेक्षा कर देता है, और दूसरी प्रकृति
इस लिये विरत या निवृत्त होजाती है कि-“मैं देखली गई”
ऐसा उसे अपना प्रयोजन भाव प्रतीत होता है। इस कारण
दोनों को उदासीन होने से उनका संयोग होने पर भी सर्ग
(सृष्टि) का प्रयोजन नहीं है ॥६६॥
तत्त्वज्ञान के अनन्तर शरीर की स्थिति ।
सम्यग्ज्ञानाधिगमाद् धर्मादीनामकारणप्राप्तौ ।
तिष्ठतिसंस्कारवशात्,चक्रभ्रमिवद्धृतशरीरः॥६७॥
जब यथेष्ट (जैसा चाहिये) तत्त्वों का साक्षात्कार उदय
होजाता है, उस समय धर्म आदि अकारण होजाते हैं, किसी
कार्य के उत्पन्न करने में समर्थ नहीं रहते-जले हुये बीज के
समान सुख दुःखरूप अंकुरों को उत्पन्न नहीं कर सकते, इसी
से अब जो शरीर वर्त्तमान है वह कैसे रहे? किन्तु जैसे कुम्हार
का चक्र एकबार घुमाकर छोड़ देने पर भी कुछ देर बेग के
अधीन घूमता रहता है, ऐसे ही इस अन्तिम शरीर को जिस
प्रारब्ध कर्मने प्रवृत्त किया है, उसके समाप्त होने तक यह उसी
के अधीन खड़ा रहता है (अर्थात्-वेग के पूरा होते ही जैसे
कुम्हार का चक्र निष्क्रिय होजाता है, ऐसे ही यह शरीर भी
अपनी अन्तिम लीला को पूरी कर देता है-गिर जाता है या
अपने अव्यक्त कारण में लीन हो जाता है। बस संसार उस
पुरुष का पूरा होचुका तथा वह निर्वाण पद को प्राप्त होगया
फिर उसे संसार न होगा। दीपक के निर्वाण (बुझ जाने) के
दृष्टान्त से ही मोक्ष का नाम भी निर्वाण है) ॥६७॥
यदि संस्कारवश से शरीर है भी, तो कब इसका मोक्ष होगा?