सांख्य दर्शन (सांख्य-प्रवचन सूत्र व हिन्दी व्याख्या सहित)
Sankhya Darshana with Hindi Commentary
by महर्षि कपिल
Source: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (origin)
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Read in contextहिन्दी सांख्य दर्शन ( ४७ )
पुरुषस्य विमोक्षार्थं प्रवर्त्तते तद्वदव्यक्तम् ॥ ५८ ॥
जिस प्रकार लोक अपने औत्सुक्य ( चाव ) या इच्छाओं
को मिटाने के लिये क्रियाओं में प्रवृत्त होता है, तथा उस कार्य
के पूरी होने पर निवृत्त हो जाता है, वैसे ही अव्यक्त (प्रकृति )
भी पुरुष के मोक्ष के अर्थ प्रवृत्त होता है तथा निवृत्त हो
जाता है ॥ ५८ ॥
प्रकृति का प्रवर्त्तक तो पुरुषार्थ हो सकता है, किन्तु
निवृत्ति कैसे होगी ?
रङ्गस्य दर्शयित्वा निवर्त्तते नर्त्तकी यथानृत्यात् ।
पुरुषस्य तथात्मानं प्रकाश्यविनिर्वर्त्तते प्रकृतिः ५९
( समाधान- ) रङ्ग ( सभा ) को नर्त्तकी (वेश्या) अपना
नृत्य दिखाकर जिस प्रकार निवृत्त हो जाती है, उसी प्रकार
प्रकृति भी पुरुष के प्रति अपने आपे को दिखाकर निवृत्त हो
जाती है। प्रयोजन यह है कि-उसे निवर्त्तक (निवृत्त करने वाले)
की कोई अपेक्षा नहीं है, किन्तु निवृत्ति उसकी स्वाभाविक
हो जाती है ॥ ५६ ॥
केवल परार्थ-आरम्भ के आक्षेप का समाधान ।
नानाविधैरुपायै रुपकारिण्यनुपकारिणः पुंसः
गुणवत्यगुणस्यसतः तस्यार्थमपार्थकं चरति ॥६०॥
( जिस प्रकार कोई भृत्य स्वयम् उपकारी भी होकर नि-
र्गुण या अनुपकारी स्वामी का निष्फल आराधन करता है,
उसी प्रकार ) यह तपस्विनी गुणवती उपकारिणी प्रकृति
पुरुष को अनुपकारी और निर्गुण होते हुये भी उसके अर्थ को
विना प्रयोजन ही नाना प्रकारके उपायोंसे साधन करती है ६०
वेश्या परिषद् को नृत्य दिखाकर निवृत्त हो जाती है,