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सांख्य दर्शन (सांख्य-प्रवचन सूत्र व हिन्दी व्याख्या सहित)

सांख्य दर्शन (सांख्य-प्रवचन सूत्र व हिन्दी व्याख्या सहित)

Sankhya Darshana with Hindi Commentary

by महर्षि कपिल

Source: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (origin)

DevanagariSanskritpublished81 pages

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( ४८ ) हिन्दी सांख्य दर्शन
और दर्शकों के कौतूहल के कारण फिर भी प्रवृत्त हो जाती है,
ऐसे ही प्रकृति भी निवृत्त होकर फिर प्रवृत्त हो सकती है, जिस
से कि- मुक्त हुए पुरुष का फिर बन्ध हो जाये ? इस आपत्ति
के उत्तर के अर्थ यह कारिका है—
प्रकृतेःसुकुमारतरं न किञ्चिदस्तीतिमेमतिर्भवति।
या दृष्टाऽस्मीति पुनर्नदर्शनमुपैति पुरुषस्य ॥६१॥
‘प्रकृति से अधिक सुकुमार और कोई वस्तु नहीं है’
यह मेरी (ईश्वर-कृष्ण की) मति है । जो ‘"दृष्टाऽस्मि"
(मैं देख ली गई) इस बुद्धि से फिर पुरुष के देखने में नहीं
आती ॥ ६१ ॥
बन्धन (संसार) और मोक्ष पुरुष के नहीं, प्रकृति के हैं
तस्मान्न बध्यतेऽद्धा न मुच्यतेनापिसंसरतिकश्चित्।
संसरति बध्यते मुच्यतेच नानाश्रया प्रकृतिः ॥६२॥
तिस (इस) कारण से (का० ६१) वह पुरुष न बन्धन
को प्राप्त होता है, न संसरण करता है अर्थात् एक शरीर को
छोड़ कर दूसरे शरीरमें नहीं जाता, और न मोक्षको ही प्राप्त
होता है, किन्तु नाना गुणोंको आश्रय करने वाली प्रकृति ही
संसरण करती है, बद्ध होती है, और मुक्त होती है ॥६२॥
प्रकृति के बन्ध और मोक्ष के साधन ।
रूपैः सप्तभिरेव तु बध्नात्यात्मानमात्मना प्रकृतिः ।
सैव च पुरुषार्थं प्रति विमोचयत्येकरूपेण ॥ ६३ ॥
धर्म आदि ७ भावों से प्रकृति अपने से अपने को बांध
लेती है, और वही प्रकृति पुरुषार्थ (मोक्ष या अपवर्ग) के
प्रति एक भाव (तत्व ज्ञान) से अपने को मुक्त कर देती है
तथा फिर भोग और अपवर्ग (मोक्ष) को नहीं करती ॥६३॥