सांख्य दर्शन (सांख्य-प्रवचन सूत्र व हिन्दी व्याख्या सहित)
Sankhya Darshana with Hindi Commentary
by महर्षि कपिल
Source: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (origin)
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सब प्रकृति का ही है, और साक्षात् सम्बन्ध से उसी में रहता
है । फिर अनादि काल से संसार में बंधा हुआ पुरुष छूट कैसे
सकता है, यही प्रश्न इनके मनमें हुआ । यदि ये अनिर्मोक्ष
को ही लेलेवें, तो इनके दर्शन को भी कौन पढ़े या कौन
अन्धा इनके सम्प्रदाय के वश्य हो, सुतराम् इन्हें मोक्षका
मार्ग भी बताना चाहिये जिसे और सब दर्शनकार भी अपने २
मतके अनुसार बता रहे हैं। यही सब सोच समझकर कह रहे
हैं- “ प्रति पुरुष०-०” अर्थात्-प्रकृति परिणाम शील है,तत्व-
ज्ञान और उसके साधन भी सब प्राकृत हैं,इस रीति पर जब
कभी तत्वज्ञान या प्रकृति पुरुष का भेदज्ञान हो जायगा,
तभी निर्वाण (मोक्ष) हो जायगा । इस में दूसरे का कोई
आरम्भ मानना निष्प्रयोजन है ॥५६॥
विना अधिष्ठाता के प्रधान की प्रवृत्ति में युक्ति
वत्सविवृद्धिनिमित्तं क्षीरस्य यथाप्रवृत्तिरज्ञस्य ।
पुरुषविमोक्षनिमित्तं तथाप्रवृत्तिः प्रधानस्य ॥५७॥
जिस प्रकार वत्स (शिशु) की विवृद्धि या पोषण के
लिये माता के स्तनोंका दूध अज्ञ होकर भी आपसे आप बहने
लगता है, उसी प्रकार पुरुष के मोक्ष या निर्वाणके लिये ज्ञान
शून्य (जड़) प्रकृति भी प्रवृत्त होती है । अभिप्राय यह है,कि-
उसको अपने चेतन अधिष्ठाता ईश्वर की अपनीं प्रवृत्ति में
कोई अपेक्षा नहीं है । सुतराम् वह अपने सृष्टि कार्य में स्व-
तन्त्रता से प्रवृत्त होती है । इसीसे ईश्वर तत्वकी कल्पना भी
विपश्चित्तियों को अनावश्यक है ॥ ५७ ॥
“स्वार्थ इव” का दृष्टान्त ।
औत्सुक्यविनिवृत्यर्थं यथा क्रियासु प्रवर्त्ततेलोकः ।