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सांख्य दर्शन (सांख्य-प्रवचन सूत्र व हिन्दी व्याख्या सहित)

सांख्य दर्शन (सांख्य-प्रवचन सूत्र व हिन्दी व्याख्या सहित)

Sankhya Darshana with Hindi Commentary

by महर्षि कपिल

Source: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (origin)

DevanagariSanskritpublished81 pages

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हिन्दी सांख्य दर्शन ( १६ )
प्रकृति, प्रधान, ब्रह्म, अव्यक्त, बहुधानक, और माया, ये शब्द पर्याय
(समान अर्थ के वाचक) हैं। महान्, बुद्धि, आसुरी, मति,
ख्याति और ज्ञान ये सब पर्याय हैं । ऐसे ही अहंकार,
भूतादि, वैकृत, तैजस और अभिमान, ये पर्याय हैं ॥ २२ ॥
बुद्धि का लक्षण और उस का धर्म ।
अध्यवसायोबुद्धिर्धर्मोज्ञानं विरागऐश्वर्यम् ।
सात्विकमेतद्रूपं तामसमस्माद्विपर्यस्तम् ॥२३॥
बुद्धि का लक्षण अध्यवसाय है। अर्थात् पुरुष मात्र ही
जब किसी कर्म में प्रवृत्त होता है, उस समय अन्तःकरण में
तीन वृत्तियें या क्रियाएं होती हैं, जैसे पहिले आलोचन
(वस्तु का ज्ञान) फिर ‘मैं इस में अधिकारी हूं’ ऐसा अभि-
मान, फिर ‘मुझे यह करना चाहिये’ ऐसा अध्यवसाय या
निश्चय ज्ञान होता है। इन में यह तीसरी वृत्ति या ज्ञान
जिस में होता है, वही बुद्धि है। बुद्धि में ( १ ) धर्म, ज्ञान,
वैराग्य और ऐश्वर्य्य ये चार सात्विक धर्म रहते हैं, और
अधर्म, अज्ञान, अवैराग्य तथा अनैश्वर्य्य ये चार तामस
धर्म रहते हैं ।
वैराग्य की चार अवस्थाएं होती हैं, जिन के नाम—
( १ ) यतमानसंज्ज्ञा ( २ ) व्यतिरेकसंज्ज्ञा ( ३ ) एकेन्द्रिय-
संज्ज्ञा और ( ४ ) वशीकारसंज्ज्ञा हैं ॥ २३ ॥
अहंकार का लक्षण और उसका कार्य भेद ।
अभिमानोऽहंकारः तस्माद्द्विविधःप्रवर्त्ततेसर्गः ।
एकादशकश्चगणस्तन्मात्रपञ्चकश्चैव ॥ २४ ॥
अभिमान (मैं हूं यह ज्ञान) अहंकार है। उस से दो
प्रकार की सृष्टि होती है, ( १ ) ग्यारह इन्द्रियें और ( २ )