सांख्य दर्शन (सांख्य-प्रवचन सूत्र व हिन्दी व्याख्या सहित)
Sankhya Darshana with Hindi Commentary
by महर्षि कपिल
Source: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (origin)
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Read in context( १८ ) हिन्दी सांख्य दर्शन
टकराते हुये आपस में दैव योग से मिले और उनका परस्पर
में विश्वास हुआ । अन्धे में चलने की शक्ति है, और पंगु में
देखने की, इसीसे अब वे दोनों मिलकर गमन और दर्शन
क्रियाओं को कर सकते हैं, अतः पंगु अन्धे के कन्धे पर चढा,
तो अन्धा चला और पंगुने उसे राह बताई, सुखराम् वे अपने
घर पर पहुंचे और दोनों ने अपना सम्बन्ध छोड़ा अर्थात्
संयोग का त्याग किया । ऐसे ही चेतन पुरुष प्रकृति के साथ
मिलकर उसके संयोग से ज्ञान गुण को प्राप्त होकर उसे छोड़
देता है, और वह भी अपना कार्य पूरा करके उसे छोड़ देती
है । यही मोक्ष का स्थान है, तथा संयोग और उस से सृष्टि
क्रम है ॥ २१ ॥
सृष्टि का क्रम ।
प्रकृतेर्महांस्ततोऽहंकारस्तस्माद्गणश्चषोडशकः ।
तस्मादपि षोडशकात् पञ्चभ्यः पञ्चभूतानि ॥२२॥
प्रकृति से महत् तत्व, उससे अहंकार, इस से १६ तत्त्व
( ५ ज्ञानेन्द्रियें ५ कर्मेन्द्रियें १ मन ५ तन्मात्र ) और उनमें
से भी ५ तन्मात्रों से ५ महाभूत ( पृथिवी, जल, अग्नि, वायु
और आकाश ) उत्पन्न होते हैं ॥ अर्थात् शब्द तन्मात्रसे शब्द
गुण वाला आकाश, (१) शब्द तन्मात्र से सहित; स्पर्श तन्मात्र
से शब्द और स्पर्शगुणवाला वायु, (२) शब्द और स्पर्श तन्मात्र से
सहित रूप तन्मात्र से शब्द स्पर्श और रूप गुण वाला अग्नि
( ३ ) शब्द, स्पर्श, रूप तन्मात्र से संयुक्त रस तन्मात्र से
शब्द, स्पर्श, रूप, और रस गुण वाला जल (४) और शब्द,
स्पर्श, रूप, तथा रस तन्मात्र से युक्त गन्ध तन्मात्र से शब्द,
स्पर्श, रूप, गन्धगुण वाली पृथिवी ( ५ ) उत्पन्न होती है ॥