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सर्वकोश
ऋग्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

ऋग्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

Rigveda Samhita with Hindi Translation

डा. गंगा सहाय शर्मा द्वारा

स्रोत: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (उद्गम)

DevanagariSanskritpublished1,855 पृष्ठ

पृष्ठ 989, कुल 1855 में से

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पृष्ठ 989

इमं नो अग्ने अध्वरं होतर्वयुनशो यज. चिकित्वान्दैव्यं जनम्.. (१२)
हे देवों को बुलाने वाले अग्नि! देवसमूह में उत्तम देव को जानकर हमारा यज्ञकर्म उन्हीं
की मर्यादा के अनुसार पूरा करो. (१२)
विश्वे देवाः शृणुतेमं हवं मे ये अन्तरिक्षे य उप द्यवि ष्ठ.
ये अग्निजिह्वा उत वा यजत्रा आसद्यास्मिन्बर्हिषि मादयध्वम्.. (१३)
विश्वेदेव मेरी इस पुकार को सुनें, चाहे वे अंतरिक्ष में रहते हों अथवा स्वर्ग के समीप.
अग्निरूपी जिह्वा द्वारा अथवा किसी साधन से यज्ञ का भोग करने वाले इन कुशों पर बैठकर
सोमरस द्वारा प्रसन्न बनें. (१३)
विश्वे देवा मम शृण्वन्तु यज्ञिया उभे रोदसी अपां नपाच्च मन्म.
मा वो वचांसि परिचक्ष्याणि वोचं सुम्नेष्विद्धो अन्तमा मदेम.. (१४)
विश्वेदेव, यज्ञपात्र, स्वर्ग, पृथ्वी एवं अग्नि हमारी इन स्तुतियों को सुनें. हम तुम्हें पंसद न
आने वाले स्तुति-वचन न कहें. हम तुम्हारे समीप सुख पाते हुए प्रसन्न हों. (१४)
ये के च ज्मा महिनो अहिमाया दिवो जज्ञिरे अपां सधस्थे.
ते अस्मभ्यमिषये विश्वमायुः क्षप उस्रा वरिवस्यन्तु देवाः.. (१५)
महान् व संहारक बुद्धि वाले जो देवगण धरती, स्वर्ग एवं अंतरिक्ष में उत्पन्न हुए हैं, वे
हमें और हमारी संतान को रात-दिन जीवन भर अन्न दें. (१५)
अग्नीपर्जन्याववतं धियं मेऽस्मिन्हवे सुहवा सुष्टुतिं नः.
इळामन्यो जनयद् गर्भमन्यः प्रजावतीरिष आ धत्तमस्मे.. (१६)
हे अग्नि और पर्जन्य! तुम हमारे यज्ञकार्य की रक्षा करो. हे शोभन आह्वान वाले देवो!
हमारी सुंदर स्तुति को सुनो. तुम में से पर्जन्य अन्न उत्पन्न करता है एवं अग्नि गर्भ उत्पन्न
करते हैं. तुम हमें संतान-युक्त अन्न दो. (१६)
स्तीर्ण बर्हिषि समिधाने अग्नौ सूक्तेन महा नमसा विवासे.
अस्मिन्नो अद्य विदथे यजत्रा विश्वे देवा हविषि मादयध्वम्.. (१७)
हे यज्ञपात्र विश्वेदेव! हमारे इस यज्ञ में कुश बिछ जाने पर, अग्नि प्रज्वलित हो जाने पर
एवं मेरे द्वारा स्तोत्र उच्चारण-पूर्वक तुम्हारी सेवा करने पर, तुम हव्य द्वारा तृप्त बनो. (१७)
सूक्त—५३ देवता—पूषा
वयमु त्वा पथस्पते रथं न वाजसातये. धिये पूषन्नयुज्महि.. (१)
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