ऋग्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)
Rigveda Samhita with Hindi Translation
by डा. गंगा सहाय शर्मा
Source: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (origin)
Page 988 of 1855
Read in contextतापकारी आयुध चलाओ. (३)
अवन्तु मामुषसो जायमाना अवन्तु मा सिन्धवः पिन्वमानाः.
अवन्तु मा पर्वतासो ध्रुवासोऽवन्तु मा पितरो देवहूतौ.. (४)
उत्पन्न होने वाली उषाएं मेरी रक्षा करें. विस्तृत नदियां मेरी रक्षा करें. स्थिर पर्वत मेरी
रक्षा करें. यज्ञ में उपस्थित पितर मेरी रक्षा करें. (४)
विश्वदानीं सुमनसः स्याम पश्येम नु सूर्यमुच्चरन्तम्.
तथा करद्धसुपतिर्वसूनां देवाँ ओहानोऽवसागमिष्ठः.. (५)
हम सदा शोभन-मन वाले हों. हम उदय होते हुए सूर्य को देखें. उत्तम धन के स्वामी
अग्नि हमारे दिए हव्य द्वारा देवों को धारण करते हुए हमें उक्त प्रकार का बनावें. (५)
इन्द्रो नेदिष्ठमवसागमिष्ठः सरस्वती सिन्धुभिः पिन्वमाना.
पर्जन्यो न ओषधीभिर्मयोभूरग्निः सुशंसः सुहवः पितेव.. (६)
जल से विस्तृत सरस्वती नदी एवं इंद्र रक्षा के उद्देश्य से हमारे पास आवें. पर्जन्य
ओषधियों के साथ मिलकर हमारे लिए सुखदाता बनें एवं अग्नि हमारे लिए पिता के समान
सुखपूर्वक, स्तुत्य एवं सुख से बुलाने योग्य हों. (६)
विश्वे देवास आ गत शृणुता म इमं हवम्. एदं बर्हिर्नि षीदत.. (७)
हे विश्वेदेव! आओ, मेरी पुकार सुनो और इन कुशों पर बैठो. (७)
यो वो देवा घृतस्नुना हव्येन प्रतिभूषति. तं विश्व उप गच्छथ.. (८)
हे देवो! जो घी के मिले हुए हव्य द्वारा तुम्हारी सेवा करते हैं, तुम सब उसके पास
जाओ. (८)
उप नः सूनवो गिरः शृण्वन्त्वमृतस्य ये. सुमृळीका भवन्तु नः.. (९)
अमृत के पुत्र विश्वेदेवगण हमारी स्तुतियां सुनें और हमें शोभन सुख देने वाले हों. (९)
विश्वे देवा ऋतावृध ऋतुभिर्हवनश्रुतः. जुषन्तां युज्यं पयः.. (१०)
यज्ञ को बढ़ाने वाले एवं विशेषविशेष कालों पर स्तोत्र सुनने वाले विश्वेदेव अपने योग्य
दूध स्वीकार करें. (१०)
स्तोत्रमिन्द्रो मरुद्गणस्त्वष्ट्मान् मित्रो अर्यमा. इमा हव्या जुषन्त नः.. (११)
इंद्र, मरुद्गण, त्वष्टा, मित्र और अर्यमा हमारे स्तोत्रों और हव्यों को स्वीकार करें. (११)
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