ऋग्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)
Rigveda Samhita with Hindi Translation
by डा. गंगा सहाय शर्मा
Source: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (origin)
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Read in contextहे बलपुत्र अग्नि! जो यजमान तुम्हें पिता जानता हुआ पुत्र के समान तुम्हारे हव्य को
धारण करता है, उसे तुम पाप से अलग कर दो. हे जानकार अग्नि! तुम हमें कब देखोगे? हे
यज्ञ की प्रेरणा देने वाले अग्नि! तुम हमें अच्छे रास्ते पर जाने की प्रेरणा कब दोगे? (९)
भूरि नाम वन्दमानो दधाति पिता वसो यदि तज्जोषयासे.
कुविद्देवस्य सहसा चकान: सुम्नमग्निर्वानते वावृधान:.. (१०)
हे निवासदाता एवं पालनकर्त्ता अग्नि! तुम हमें कब देखोगे? तुम उस हवि को स्वीकार
करते हो जो तुम्हारे नाम की बार-बार वंदना करके दी जाती है. यजमान द्वारा बहुत हवि पाने
के इच्छुक एवं बल से युक्त अग्नि वृद्धि पाकर सुख देते हैं. (१०)
त्वमङ्ग जरितारं यविष्ठ विश्वान्यग्ने दुरिताति पर्षि.
स्तेना अदृश्रन्निपवो जनासोऽज्ञातकेता वृजिना अभूवन्.. (११)
हे स्वामी एवं अतिशय युवा अग्नि! तुम स्तुतिकर्त्ता पर अनुग्रह करके उसे सभी पापों से
छुड़ा देते हो. उसे चोर दिखाई देने लगते हैं एवं अनजाने चिह्नों वाले शत्रु लोग उससे दूर हो
जाते हैं. (११)
इमे यामासस्त्वद्रिग्भूवन्वसवे वा तदिदागो अवाचि.
नाहायमग्निरभिशस्तये नो न रीषते वावृधान: परा दात्.. (१२)
वे स्तुतिसमूह तुम्हारे सामने जाते हैं. निवासदाता अग्नि के सामने अपराध को स्वीकार
करते हैं. अग्नि हमारी स्तुति से बढ़ते हुए हमें निंदक अथवा हिंसक के हाथ में न सौंपे. (१२)
सूक्त—४ देवता—अग्नि
त्वामग्ने वसुपतिं वसूनामभि प्र मन्दे अध्वरेषु राजन्.
त्वया वाजं वाजयन्तो जयेमाभि ष्याम पृत्सुतीर्मर्त्यानाम्.. (१)
हे संपत्तियों के स्वामी अग्नि! हम तुम्हें लक्ष्य करके यज्ञों में स्तुति करते हैं. हे तेजस्वी
अग्नि! हम अन्न के अभिलाषी तुम्हारी कृपा से अन्न प्राप्त करें एवं मानवों की सेना को जीतें.
(१)
हव्यवाळग्निरजर: पिता नो विभुर्विभावा सुदृशीको अस्मे.
सृगार्हपत्या: समिषो दिदीह्यस्मद्र्य१क्सं मिमीहि श्रवांसि.. (२)
हव्य वहन करने वाले अग्नि जरारहित होकर हमारे पालक बनें एवं हमारे प्रति व्यापक,
तेजस्वी एवं दर्शनीय हों. हे अग्नि! शोभन गार्हपत्य से युक्त अन्नों को तुम भली प्रकार प्रदान
करो तथा हमें प्रचुर मात्रा में अन्न दो. (२)
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