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ऋग्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

ऋग्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

Rigveda Samhita with Hindi Translation

by डा. गंगा सहाय शर्मा

Source: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (origin)

DevanagariSanskritpublished1,855 pages

Page 779 of 1855

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Page 779

विशां कविं विशपतिं मानुषीणां शुचिं पावकं घृतपृष्ठमग्निम्.
नि होतारं विश्वविदं दधिध्वे स देवेषु वनते वार्याणि.. (३)
हे ऋत्विजो! तुम मानवी प्रजाओं के स्वामी, मेधावी, पवित्र, दूसरों को पवित्र करने
वाले, प्रदीप्त शरीर, होता एवं सर्वज्ञ अग्नि को धारण करो. वे देवों के संगृहीत धन को हम
लोगों में बांटते हैं. (३)
जुषस्वाग्न इळया सजोषा यतमानो रश्मिभिः सूर्यस्य.
जुषस्व नः समिधं जातवेद आ च देवान्हविर्द्याय वक्षि.. (४)
हे अग्नि! तुम धरती के साथ प्रेमयुक्त एवं सूर्यकिरणों के साथ गतियुक्त होकर हमारी
स्तुतियां स्वीकार करो. हे जातवेद! हमारे द्वारा दी गई समिधाओं को स्वीकार करो. तुम हव्य-
भोजन के निमित्त देवों को बुलाओ एवं हव्यवहन करो. (४)
जुष्टो दमूना अतिथिर्र्दुरोण इमं नो यज्ञमुप याहि विद्वान्.
विश्वा अग्ने अभियुजो विहत्या शत्रूयतामा भरा भोजनानि.. (५)
हे अग्नि! तुम महान्, शांतचित्त एवं अतिथि के समान पूज्य बनकर हमारे इस यज्ञ में
आओ. हे जानकार अग्नि! तुम सभी शत्रुओं को नष्ट करो एवं शत्रुता करने वालों का धन
छीन लो. (५)
वधेन दस्युं प्र हि चातयस्व वयः कृण्वानस्तन्वे३स्वायै.
पिपर्षि यत्सहसस्पुत्र देवान्त्सो अग्ने पाहि नृतम वाजे अस्मान्.. (६)
हे अग्नि! तुम यजमान रूपी पुत्रों को अन्न देते हो एवं शत्रुओं का आयुधों द्वारा विनाश
करते हो. हे नेताओं में श्रेष्ठ अग्नि! तुम संग्राम में हमारी रक्षा करो. (६)
वयं ते अग्ने उक्थैर्विधेम वयं हव्यैः पावक भद्रशोचे.
अस्मे रयिं विश्ववारं समिन्वास्मे विश्वानि द्रविणानि धेहि.. (७)
हे अग्नि! हम लोग स्तोत्र-समूहों एवं हव्य अन्नों द्वारा तुम्हारी सेवा करेंगे. हे पवित्रकर्त्ता
तथा कल्याणकारी प्रकाशयुक्त अग्नि! हमें सबके द्वारा चाहा गया धन दो एवं सभी संपत्तियां
हमें प्रदान करो. (७)
अस्माकमग्ने अध्वरं जुषस्व सहसः सूनो त्रिषधस्थ हव्यम्.
वयं देवेषु सुकृतः स्याम शर्मणा नस्त्रिवरूथेन पाहि.. (८)
हे अग्नि! हम लोगों के यज्ञ को स्वीकार करो. हे बल के पुत्र एवं तीन स्थानों में रहने
वाले अग्नि! तुम हव्य को स्वीकार करो. हम देवों के मध्य रहकर शोभन कर्म करने वाले बनें.
तुम तीन प्रकार के उत्तम सुखों द्वारा हमारी रक्षा करो. (८)
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