Skip to content
SarvaKosh
ऋग्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

ऋग्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

Rigveda Samhita with Hindi Translation

by डा. गंगा सहाय शर्मा

Source: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (origin)

DevanagariSanskritpublished1,855 pages

Page 777 of 1855

Read in context
Page 777

निमित्त विष्णु का व्यापक पद निश्चित है, जो विद्युत्संबंधी, चित्रविचित्र, मनोहर एवं अगम्य है,
उसी पद पर रहकर तुम गोपनीय नामक उदक धारण करते हो. (३)
तव श्रिया सुदृशो देव देवाः पुरू दधाना अमृतं सपन्त.
होतारमग्निं मनुषो नि षेदुर्दशस्यन्त उशिजः शंसमायोः.. (४)
हे अग्नि! तुम्हारी समृद्धि के द्वारा ही इंद्र आदि देव दर्शनीय बनते हैं एवं प्रीति धारण
करते हुए अमृत प्राप्त करते हैं. ऋत्विज् फल चाहने वाले यजमान के कल्याण के निमित्त
हव्य देते हुए होतारूप अग्नि की सेवा करते हैं. (४)
न त्वद्धोता पूर्वो अग्ने यजीयान्न काव्यैः परो अस्ति स्वधावः.
विशश्च यस्या अतिथिर्भवासि स यज्ञेन वनवद्देव मर्तान्.. (५)
हे अग्नि! तुम्हारे अतिरिक्त कोई होता, यज्ञ करने वाला एवं प्राचीन नहीं है. हे अन्न के
स्वामी अग्नि! भविष्य में भी कोई तुम्हारे समान नहीं होगा. तुम जिस ऋत्विज् के अतिथि
बनते हो. वह यज्ञ करके शत्रुओं को नष्ट कर देता है. (५)
वयमग्ने वनुयाम त्वोता वसूयवो हविषा बुध्यमानाः.
वयं समर्यै विदथेष्वह्वां वयं राया सहसस्पुत्र मर्तान्.. (६)
हे अग्नि! हम तुम्हारे द्वारा सुरक्षित होकर शत्रुओं को पीड़ित करेंगे. धन की कामना
करने वाले हम तुम्हें हव्य द्वारा प्रज्वलित करते हैं. हम यज्ञों में यश एवं युद्धों में विजय प्राप्त
करें. हे बलपुत्र अग्नि! हम धन के साथ पुत्र-पौत्र को प्राप्त करें. (६)
यो न आगो अभ्येनो भरात्यधीदघमघशंसे दधात.
जही चिकित्वो अभिशस्तिमेतामग्ने यो नो मर्चयति द्वयेन.. (७)
जो व्यक्ति हमारे प्रति पाप या अपराध करता है, अग्नि उस पापी व्यक्ति के प्रति बुरा
व्यवहार करें. हे जानकार अग्नि! जो पाप या अपराध द्वारा हमारे काम में बाधा डालता है,
उसी पापी को नष्ट करो. (७)
त्वामस्या व्युषि देव पूर्वे दूतं कृण्वाना अयजन्त हव्यैः.
संस्थे यदग्न ईयसे रयीणां देवो मर्तैर्वसुभिरिध्यमानः.. (८)
हे दीप्तियुक्त अग्नि! प्राचीन यजमान तुम्हें देवों का दूत बनाते हुए उषाकाल में यज्ञ
करते थे. हे अग्नि! हव्य एकत्र हो जाने के बाद तुम तेजस्वी बनते हो एवं निवास देने वाले
मानवों द्वारा प्रज्वलित किए जाते हो. (८)
अव स्मृधि पितरं योधि विद्वान्पुत्रो यस्ते सहसः सून ऊहे.
कदा चिकित्वो अभि चक्षसे नोऽग्ने कदाँ ऋतचिद्यातयासे.. (९)
ebook converter DEMO Watermarks*