ऋग्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)
Rigveda Samhita with Hindi Translation
by डा. गंगा सहाय शर्मा
Source: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (origin)
Page 776 of 1855
Read in contextमदे चिदस्य प्र रुजन्ति भामा न वरन्ते परिबाधो अदेवीः.. (१०)
शब्द करने वाली अग्नि की ज्वालाएं तीखे आयुधों के समान राक्षसों को नष्ट करने के
लिए स्वर्ग में उत्पन्न होती हैं. हर्षित होने पर अग्नि का प्रकाश राक्षसों को पीड़ा देता है. बाधा
पहुंचाने वाली असुर-सेना अग्नि को नहीं रोक पाती. (१०)
एतं ते स्तोमं तुविजात विप्रो रथं न धीरः स्वपा अतक्षम्.
यदीदग्ने प्रति त्वं देव हर्याः स्वर्वतीरप एना जयेम.. (११)
हे अनेकरूप-धारक अग्नि! धीर एवं शोभन कर्म वाले लोग जिस प्रकार रथ बनाते हैं,
उसी प्रकार हम स्तोताओं ने तुम्हारे लिए स्तुतियां बनाई हैं. हे अग्नि! यदि तुम इसे स्वीकार
कर लो तो हम विस्तृत जय प्राप्त करेंगे. (११)
तुविग्रीवो वृषभो वावृधानोऽशत्र्वर्यः समजाति वेदः.
इतीममग्निममृता अवोचन्बर्हिष्मते मनवे शर्म यंसद्धविष्मते मनवे शर्म यंसत्.. (१२)
अनेक ज्वालाओं वाले, कामवर्षी एवं बढ़ते हुए अग्नि अबाध रूप से शत्रु के धन पर
अधिकार करते हैं. यह बात देवों ने अग्नि से कही थी. वे यज्ञ करने वाले एवं हवि देने वाले
लोगों को सुख दें. (१२)
सूक्त—३ देवता—अग्नि
त्वमग्ने वरुणो जायसे यत्त्वं मित्रो भवसि यत्समिद्धः.
त्वे विश्वे सहसस्पुत्र देवास्त्वमिन्द्रो दाशुषे मर्त्याय.. (१)
हे अग्नि! तुम उत्पन्न होते ही वरुण, (अंधकार निवारक एवं प्रज्वलित) होकर मित्र
(हितकारी) बन जाते हो. सब देवगण तुम्हारे पीछे चलते हैं. हे बल के पुत्र! हव्य देने वाले
यजमान के इंद्र तुम्हीं हो. (१)
त्वमर्यमा भवसि यत्कनीनां नाम स्वधावन्गुह्यं बिभर्षि.
अञ्जन्ति मित्रं सुधितं न गोभिर्यद्दम्पती समनसा कृणोषि.. (२)
हे अग्नि! तुम कन्याओं के लिए अर्यमा (नियमन करने वाले) बनते हो. हे स्वधावान्
अग्नि! तुम ही गोपनीय नाम 'वैश्वानर' धारण करते हो. जब तुम पति-पत्नी को एक मन
वाला बना देते हो, तब वे तुम्हें मित्र मानकर गाय के दूध-घी से सींचते हैं. (२)
तव श्रिये मरुतो मर्जयन्त रुद्र यत्ते जनिम चारु चित्रम्.
पदं यद्विष्णोरुपमं निधायि तेन पासि गुह्यं नाम गोनाम्.. (३)
हे अग्नि! तुम्हारे बैठने के लिए मरुद्गण अंतरिक्ष को साफ करते हैं. हे इंद्र! तुम्हारे
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