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ऋग्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

ऋग्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

Rigveda Samhita with Hindi Translation

by डा. गंगा सहाय शर्मा

Source: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (origin)

DevanagariSanskritpublished1,855 pages

Page 775 of 1855

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Page 775

हमने क्षेत्र में गोसमूह के समान चुपचाप घूमते हुए एवं स्वयं अधिक रूप से सुशोभित
अग्नि को देखा है. लोग पिशाची के आक्रमण के समय वाली अग्नि की पीली ज्वालाओं को
स्वीकार नहीं करते, अग्नि पुनः उत्पन्न हुए एवं उनकी वृद्धा ज्वालाएं युवा बन गईं. (४)
के मे मर्दकं वि यवन्त गोभिर्न येषां गोपा अरणश्चिदास.
य ईं जगृभुरव ते सृजन्त्वाजाति पश्च उप नश्चिकित्त्वान्.. (५)
हमारे राष्ट्र को गायों से पृथक् किसने किया था? क्या उन गायों के साथ रक्षक नहीं था?
हमारे राष्ट्र पर अधिकार करने वाले लोग नष्ट हों. हमारी अभिलाषा को जानने वाले अग्नि
हमारे पशुओं को निकट लावें. (५)
वसां राजानं वसतिं जनानामरातयो नि दधुर्मर्त्येषु.
ब्रह्माण्यत्रे रव तं सृजन्तु निन्दितारो निन्द्यासो भवन्तु.. (६)
प्राणियों के राजा एवं मानवों के निवासस्वरूप अग्नि को शत्रुओं ने प्रजाओं में छिपाकर
रखा है. अत्रिगोत्र वाले वृक्ष के स्तोत्र अग्नि को उजागर करें एवं हमारे निंदक निंदा के पात्र
बनें. (६)
शुनश्चिच्छेपं निदितं सहस्राद्यूपादमुञ्चो अशमिष्ट हि षः.
एवास्मदग्ने वि मुमुग्धि पाशान्होतश्चिकित्व इह तू निषद्य.. (७)
हे अग्नि! तुमने भली प्रकार बंधे हुए शुनःशेप ऋषि को हजारों रूप वाले यूप से छुड़ाया
था, क्योंकि उसने तुम्हारी स्तुति की थी. हे होता एवं ज्ञानसंपन्न अग्नि! इस वेदी पर बैठो एवं
हमें सभी बंधनों से मुक्त करो. (७)
हृणीयमानो अप हि मदैयेः प्र मे देवानां व्रतपा उवाच.
इन्द्रो विद्वाँ अनु हि त्वा चचक्ष तेनाहमग्ने अनुशिष्ट आगाम्.. (८)
हे अग्नि! तुम क्रुद्ध होने पर हमारे पास से चले जाते हो. देवों का व्रत पालन करने वाले
इंद्र ने हमसे यह कहा था. विद्वान् इंद्र ने तुम्हें देखा था. हे अग्नि! उनके अनुशासन में रहकर
हम तुम्हारे समीप आवेंगे. (८)
वि ज्योतिषा बृहता भात्यग्निरविर्विश्वानि कृणुते महित्वा.
प्रादेवीर्मायाः सहते दुरेवाः शिशीते शृङ्गे रक्षसे विनिक्षे.. (९)
अग्नि महान् तेज द्वारा विशेष प्रकार से चमकते हैं. एवं अपनी महिमा द्वारा सभी
पदार्थों को प्रकट करते हैं. वे प्रज्वलित होकर आसुरी दुःखजनक माया को नष्ट करते हैं एवं
राक्षसों को नष्ट करने हेतु ज्वलारूपी सींगों को पैना बनाते हैं. (९)
उत स्वानासो दिवि षन्त्वग्नेस्तिग्मायुधा रक्षसे हन्तवा उ.
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