ऋग्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)
Rigveda Samhita with Hindi Translation
by डा. गंगा सहाय शर्मा
Source: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (origin)
Page 1770 of 1855
Read in contextभोजमश्वाः सुष्टुवाहो वहन्ति सुवृद्रथो वर्तते दक्षिणायाः.
भोजं देवासोऽवता भरेषु भोजः शत्रून्त्समनीकेषु जेता.. (११)
भली प्रकार बोझ ढोने वाले घोड़े दक्षिणादाता को वहन करते हैं. उसीके लिए सुनिर्मित
रथ मिलता है, युद्ध में देवगण दाता की रक्षा करते हैं. वह शत्रुओं को जीतता है. (११)
सूक्त—१०८ देवता—पणि एवं सरमा
किमिच्छन्ती सरमा प्रेदमानड् दूरे ह्यध्वा जगुरिः पराचैः.
कास्मेहितिः का परितक्म्यासीत्कथं रसाया अतरः पयांसि.. (१)
पणि बोले—“हे सरमा! तुम क्या अभिलाषा करती हुई यहां आई हो? इधर यह मार्ग
बहुत दूर का एवं चक्कर वाला है, इस पर चलना कठिन है. हमारे पास ऐसी कौन सी वस्तु है,
जिसके लिए तुम आई हो? तुम्हें आने में कितनी रातें लगीं और तुमने नदी कैसे पार की?”
(१)
इन्द्रस्य दूतीरिषिता चरामि मह इच्छन्ती पणयो निधीन्वः.
अतिष्कदो भियसा तन्न आवत्तथा रसाया अतरं पयांसि.. (२)
सरमा बोली—“हे पणियो! मैं इंद्र की दूती हूं और उन्हीं के भेजने से आई हूं. मैं तुम्हारे
द्वारा एकत्रित गायों रूपी निधि को लेने की इच्छा से आई हूं. मेरी छलांग से डरकर नदी के
जल ने मुझे बचाया. इस प्रकार मैंने नदी का जल पार किया.” (२)
कीदृङ्ङिन्द्रः सरमे का दृशीका यस्येदं दूतीरसरः पराकात्.
आ च गच्छान्मित्रमेना दधामाथा गवां गोपर्तिनों भवाति.. (३)
पणियों ने कहा—“हे सरमा! तुम जिस इंद्र की दूती बनकर इतनी दूर आई हो, वह
कैसा है और उसकी सेना कैसी है? इंद्र यहा आवें. हम उन्हें मित्र स्वीकार करेंगे. वे हमारी
गायों के स्वामी बन जावें.” (३)
नाहं तं वेद दभ्यं दभत्स यस्येदं दूतीरसरं पराकात्.
न तं गूहन्ति स्रवतो गभीरा हता इन्द्रेण पणयः शयध्वे.. (४)
सरमा बोली—“हे पणियो! मैं उन इंद्र के हराने वाले को नहीं जानती. वे सबका नाश
करते हैं. गहरी नदियां भी उन्हें नहीं रोक पातीं. वे तुम्हें मारकर धरती पर सुला देंगे.” (४)
इमा गावः सरमे या ऐच्छः परि दिवो अन्तान्त्सुभगे पतन्ती.
कस्त एना अव सृजादय्युध्युतास्माकमायुधा सन्ति तिग्मा.. (५)
पणियों ने कहा—“हे स्वर्ग की अंतिम सीमा से आने वाली सुंदरी सरमा! इन गायों में से
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