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ऋग्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

ऋग्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

Rigveda Samhita with Hindi Translation

by डा. गंगा सहाय शर्मा

Source: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (origin)

DevanagariSanskritpublished1,855 pages

Page 1748 of 1855

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Page 1748

इष्कृतिर्नाम वो माताथो यूयं स्थ निष्कृतीः.
सीराः पतत्रिणीः स्थन यदामयति निष्कृथ.. (९)
हे ओषधियो! तुम्हारी माता का नाम इष्कृति अर्थात् रोगविनाशिका है, इसलिए तुम भी
इष्कृति हो. तुम रोग को बाहर निकालने वाली एवं पतनयुक्त हो. तुम रोगी को स्वस्थ करो.
(९)
अति विश्वाः परिष्ठाः स्तेनइव व्रजमक्रमः.
ओषधीः प्राचुच्यवुर्यत्किं च तन्वो३ रपः.. (१०)
सर्वत्र व्याप्त एवं सब ओर स्थित ओषधियां रोगों को इस प्रकार लांघ जाती हैं, जिस
प्रकार चोर गोशाला को लांघ जाता है. शरीर में जो भी व्याधि होती है, उसे ओषधियां नष्ट
करती हैं. (१०)
यदिमा वाजयन्नहमोषधीर्हस्त आदधे.
आत्मा यक्ष्मस्य नश्यति पुरा जीवगृभो यथा.. (११)
जब मैं रोगी को शक्तिशाली बनाता हुआ इन ओषधियों को हाथ में लेता हूं, तब रोग की
आत्मा उसी प्रकार नष्ट होती है, जैसे मृत्यु से जीव नष्ट हो जाता है. (११)
यस्यौषधीः प्रसर्पथाङ्गमङ्गं परुष्परुः. ततो यक्ष्मं वि बाधध्व उग्रो मध्यमशीरिव.. (१२)
हे ओषधियो! तुम जिसके अंगअंग एवं गांठगांठ में आश्रय लेती हो, उसके शरीर से रोग
इस प्रकार दूर कर देती हो, जिस प्रकार शक्तिशाली राजा चोर को देश से निकाल देता है.
(१२)
साकं यक्ष्म प्र पत चाषेण किकिदीविना.
साकं वातस्य ध्राज्या साकं नश्य निहाकया.. (१३)
हे व्याधि! तुम नीलकंठ, बाज, वायु अथवा गोह के समान रोगी के शरीर से जल्दी दूर
चली जाओ. (१३)
अन्या वो अन्यामवत्वन्यान्यस्या उपावत.
ताः सर्वाः संविदाना इदं मे प्रावता वचः.. (१४)
हे ओषधियो! तुम में से पहली दूसरी के और दूसरी तीसरी के पास जावे. इस प्रकार
सब ओषधियां मिलकर मेरे वचन की रक्षा करें. (१४)
याः फलिनीर्या अफला अपुष्पा याश्च पुष्पिणीः.
बृहस्पतिप्रसूतास्ता नो मुञ्चन्त्वंहसः.. (१५)
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