ऋग्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)
Rigveda Samhita with Hindi Translation
by डा. गंगा सहाय शर्मा
Source: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (origin)
Page 1639 of 1855
Read in contextद्यावा यमग्निं पृथिवी जनिष्टामपस्त्वष्टा भृगवो यं सहोभिः.
ईळेन्यं प्रथमं मातरिश्वा देवास्ततक्षुर्मनवे यजत्रम्.. (९)
अग्नि को द्यावा-पृथिवी ने जन्म दिया है. जलों, त्वष्टा और भृगुओं ने तेजों द्वारा प्राप्त
किया है. वायु तथा अन्य देवों ने अग्नि को मानवों के यज्ञ के लिए बनाया है. (९)
यं त्वा देवा दधिरे हव्यवाहं पुरुस्पृहो मानुषासो यजत्रम्.
स यामन्नग्ने स्तुवते वयो धाः प्र देवयन्यशसः सं हि पूर्वीः.. (१०)
हे हव्य वहन करने वाले अग्नि! देवों ने तुम्हें धारण किया. हे यज्ञ योग्य अग्नि!
अभिलाषाएं करने वाले मनुष्यों ने तुम्हें धारण किया. हे अग्नि! यज्ञ में मुझ स्तोता को अन्न
दो. देवाभिलाषी यजमान तुमसे बहुत से यश प्राप्त करता है. (१०)
सूक्त—४७ देवता—विकुंठा संबंधी इंद्र
जगृभ्मा ते दक्षिणमिन्द्र हस्तं वस्यवो वसुपते वसूनाम्.
विद्मा हि त्वा गोपतिं शूर गोनामस्मभ्यं चित्रं वृषणं रयिं दाः.. (१)
हे बहुत से धनों के स्वामी इंद्र! हम धन की अभिलाषा से तुम्हारा दायां हाथ पकड़ते हैं.
हे शूर इंद्र! हम तुम्हें बहुत सी गायों का स्वामी जानते हैं. तुम हमें वर्षक एवं विचित्र धन दो.
(१)
स्वायुधं स्ववसं सुनीथं चतुः समुद्रं धरुणं रयीणाम्.
चर्कृत्यं शंस्यं भूरिवारमस्मभ्यं चित्रं वृषणं रयिं दाः.. (२)
हे इंद्र! हम तुम्हें शोभन आयुध वाला, उत्तम रक्षा से युक्त, सुंदर नयनों वाला, चारों
सागरों को यश से व्याप्त करने वाला, धनों को धारण करने वाला, बार-बार स्तुति करने योग्य
एवं अनेक दुःखों का निवारक जानते हैं. तुम हमें वर्षक एवं विचित्र धन दो. (२)
सुब्रह्माणं देववन्तं बृहन्तमुरुं गभीरं पृथुबुध्नमन्द्र.
श्रुतऋषिमुग्रमभिमातिषाहमस्मभ्यं चित्रं वृषणं रयिं दाः.. (३)
हे इंद्र! तुम हमें शोभन स्तुतियों वाला, देवों को मानने वाला, महान्, विस्तृत, गंभीर,
विस्तृत मूल वाला, विशिष्ट ज्ञान वाला, शक्तिशाली व शत्रुपराभवकारी पुत्र दो. तुम हमें वर्षक
और विचित्र धन दो. (३)
सनद्वाजं विप्रवीरं तरुत्रं धनस्पृतं शूशुवांसं सुदक्षम्.
दस्युहनं पूर्भिदमिन्द्र सत्यमस्मभ्यं चित्रं वृषणं रयिं दाः.. (४)
हे इंद्र! तुम हमें अन्न प्राप्त करने वाला, मेधावी, तारने वाला, धनपूर्ण करने वाला,
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