ऋग्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)
Rigveda Samhita with Hindi Translation
by डा. गंगा सहाय शर्मा
Source: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (origin)
Page 1589 of 1855
Read in contextहे महान् होता नामधारी, रमणीय, घी की आहुति से पूर्ण मुख वाले, प्रज्वलित व व्याप्त
तेजों के कारण ज्ञानयुक्त अग्नि! यजमान आनंद पाने के लिए तुम्हें नियमित रूप से स्थापित
करते हैं. (७)
अग्ने शुक्रेण शोचिषोरु प्रथयसे बृहत्.
अभिक्रन्दन्वृषायसे वि वो मदे गर्भं दधासि जामिषु विवक्षसे.. (८)
हे महान् अग्नि! तुम अपने उज्ज्वल तेज के कारण अधिक प्रसिद्ध होते हो. तुम समय-
समय पर बैल के समान शब्द करते हो. हे महान् अग्नि! तुम सोम आदि की प्रसन्नता के लिए
अपनी बहिनों के समान ओषधियों में गर्भ धारण करते हो. (८)
सूक्त—२२ देवता—इंद्र
कुह श्रुत इन्द्रः कस्मिन्नद्य जने मित्रो न श्रूयते.
ऋषीणां वा यः क्षये गुहा वा चकृषे गिरा.. (१)
इंद्र आज कहां प्रसिद्ध हैं? आज वे मित्र के समान किस व्यक्ति के पास सुने जाते हैं?
क्या इंद्र की स्तुतियां ऋषियों के निवासस्थानों अथवा गुफाओं में की जाती हैं? (१)
इह श्रुत इन्द्रो अस्मे अद्य स्तवे वज्र्युचीषमः.
मित्रो न यो जनेष्वा यशश्चक्रे असाम्या.. (२)
इंद्र आज इस यज्ञ में प्रसिद्ध हैं. आज हम वज्रधारी एवं स्तुति के योग्य इंद्र की स्तुतियां
करते हैं. इंद्र स्तोताओं को मित्र के समान असाधारण यश देने वाले हैं. (२)
महो यस्पतिः शवसो असाम्या महो नृम्णस्य तूतुजिः.
भर्ता वज्रस्य धृष्णोः पिता पुत्रमिव प्रियम्.. (३)
शक्ति के स्वामी, महान्, अनंत गुणयुक्त व स्तोताओं को महान् धन देने वाले इंद्र
शत्रुपराभवकारी वज्र धारण करते हैं. पिता जिस प्रकार पुत्र की अभिलषित वस्तु की रक्षा
करता है, उसी प्रकार इंद्र हमारी मनचाही वस्तुओं की रक्षा करें. (३)
युजानो अश्वा वातस्य धुनी देवो देवस्य वज्रिवः.
स्यन्ता पथा विरुकमता सृजानः स्तोष्यध्वनः.. (४)
हे वज्रधारी एवं दीप्तिशाली इंद्र! तुम दीप्तिशाली, वायु से भी तेज चलने वाले एवं
तेजस्वी मार्ग से जाने वाले हरि नामक घोड़ों को रथ में जोड़कर युद्ध में जाने का मार्ग बनाते
हुए प्रशंसित होते हो. (४)
त्वं त्या चिद्धातस्याश्वागा ऋज्रा त्मना वहध्यै.
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