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ऋग्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

ऋग्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

Rigveda Samhita with Hindi Translation

by डा. गंगा सहाय शर्मा

Source: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (origin)

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DevanagariSanskritpublished1,855 pages

Page 1588 of 1855

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Page 1588

को बुलाने वाले तुम्हारा वरण करते हैं. तुम ओषधियों में सोने वाले, पवित्र दीप्तियुक्त एवं
महान् हो. (१)
त्वामु ते स्वाभुवः शुम्भन्त्यश्वराधसः.
वेति त्वामुपसेचनी वि वो मद ऋजीतिरग्न आहुतिर्विवक्षसे.. (२)
हे अग्नि! स्वयं प्रकाश से दीप्त एवं विस्तृत धन वाले यजमान तुम्हारी शोभा बढ़ाते हैं.
टपकने वाली एवं सरल गतियुक्त आहुति तुझ महान् अग्नि को प्रसन्न करने के लिए जाती है.
(२)
त्वे धर्माण आसते जुहूभिः सिञ्चतीरिव.
कृष्णा रूपाण्यर्जुना वि वो मदे विश्वा अधि श्रियो धिषे विवक्षसे.. (३)
हे अग्नि! यज्ञधारण करने वाले यजमान यज्ञ के जुहू नामक पात्रों से उसी प्रकार तुम्हारी
सेवा करते हैं, जिस प्रकार वर्षा का जल धरती को सींचता है. हे महान् अग्नि! देवों की
प्रसन्नता के लिए तुम काले और श्वेत रंग की ज्वालाओं के रूप में सब शोभा धारण करते हो.
(३)
यमग्ने मन्यसे रयिं सहसावन्नमर्त्य.
तमा नो वाजसातये वि वो मदे यज्ञेषु चित्रमा भरा विवक्षसे.. (४)
हे शक्तिशाली एवं मरणरहित अग्नि! तुम जिस धन को उत्तम मानते हो, उसे अन्नलाभ
के लिए हमारे पास ले आओ. हे महान् अग्नि! तुम सब देवों की प्रसन्नता के लिए धन लाओ.
(४)
अग्निर्जातो अथर्वणा विदद्विश्वानि काव्या.
भुवद्दूतो विवस्वतो वि वो मदे प्रियो यमस्य काम्यो विवक्षसे.. (५)
अथर्वा ऋषि द्वारा उत्पन्न किए गए अग्नि सभी स्तुतियों को जानते हैं एवं देवों को
बुलाने के लिए यजमान के दूत बनते हैं. महान् अग्नि यजमान के प्रिय एवं प्रार्थनीय बनते हैं.
(५)
त्वां यज्ञेष्वीळतेऽग्ने प्रयत्यध्वरे.
त्वं वसूनि काम्या वि वो मदे विश्वा दधासि दाशुषे विवक्षसे.. (६)
हे अग्नि! यज्ञ आरंभ होने पर एवं हवि समीप आने पर यजमान तुम्हारी प्रार्थना करते
हैं. हे महान् अग्नि! तुम हवि देने वाले विमद ऋषि के लिए सभी उत्तम धन देते हो. (६)
त्वां यज्ञेष्वृत्विजं चारुमग्ने नि षेदिरे.
घृतप्रतीकं मनुषो वि वो मदे शुक्रं चेतिष्ठमक्षभिर्विवक्षसे.. (७)
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