ऋग्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)
Rigveda Samhita with Hindi Translation
by डा. गंगा सहाय शर्मा
Source: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (origin)
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Read in contextयदग्ने स्यामहं त्वं त्वं वा घा स्या अहम्. स्युष्टे सत्या इहाशिषः.. (२३)
हे अग्नि! यदि मैं तुम्हारे समान बहुत धन वाला हो जाऊं और तुम मेरे समान दरिद्र बन
जाओ, तब तुम्हारा आशीर्वाद सत्य हो. (२३)
वसुर्वसुपतिर्हि कमस्यग्ने विभावसुः. स्याम ते सुमतावपि.. (२४)
हे अग्नि! तुम दीप्तिरूपी धन वाले, धनस्वामी व निवासस्थान देने वाले हो. हम तुम्हारे
अनुग्रह में रहें. (२४)
अग्ने धृतव्रताय ते समुद्रायेव सिन्धवः. गिरो वाश्रास ईरते.. (२५)
हे यज्ञकर्म धारण करने वाले अग्नि! मेरी स्तुतियां तुम्हारे समीप उसी प्रकार पहुंचती हैं,
जिस प्रकार नदियां समुद्र के पास जाती हैं. (२५)
युवानं विशपतिं कविं विश्वादं पुरुवेपसम्. अग्निं शुम्भामि मन्मभिः.. (२६)
मैं स्तुतियों द्वारा नित्यतरुण, प्रजाओं के स्वामी, कवि, सभी हवियों को खाने वाले एवं
बहुत कर्म करने वाले अग्नि को सुशोभित करता हूं. (२६)
यज्ञानां रथ्ये वयं तिग्मजम्भाय वीळवे. स्तोमैरिक्षेमाग्नये.. (२७)
हम यज्ञों के नेता, तीखी ज्वालाओं वाले एवं शक्तिशाली अग्नि के लिए स्तुतियां करना
चाहते हैं. (२७)
अयमग्ने त्वे अपि जरिता भूतु सन्त्य. तस्मै पावक मृळय.. (२८)
हे सेवा योग्य एवं पवित्रकर्त्ता अग्नि! हमारा स्तोता तुम्हारी स्तुति करे और तुम उसे सुख
दो. (२८)
धीरो ह्यस्यद्मसद् विप्रो न जागृविः सदा. अग्ने दीदयसि द्यवि.. (२९)
हे अग्नि! तुम धीर, हवि में स्थित रहने वाले एवं मेधावी के समान प्रजाओं के हित में
सदा जागृत रहते हो एवं सदा अंतरिक्ष में दीप्त रहते हो. (२९)
पुराग्ने दुरितेभ्यः पुरा मृध्रेभ्यः कवे. प्र ण आयुर्वसो तिर.. (३०)
हे कवि एवं वासदाता अग्नि! हमें पापियों एवं हिंसकों के सामने से बचाकर हमारी उमर
बढ़ाओ. (३०)
सूक्त—४५ देवता—इंद्र
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